उत्तराखंड की त्रासदी - 01
प्रिय,
देशवाशियों
उत्तराखंड की त्रासदी आप सभी टी0वी0 में देख ही रहे होंगे। और इस त्रासदी की
रिपोर्टिंग भी देख,सुन व पढ़ भी रहे होंगे। टी0वी0 पत्रकार व एंकर गला फाड़-फाड़ कर चिल्ला रहे
हैं की देखिये हमारा चैनल सबसे पहले केदार नाथ पहुंचा है और आपको एक्सक्लूसिव
तस्वीरें दिखा रहा है। लगभग सभी सबसे पहले पहुँचने का दावा कर रहे हैं।
ऐसी रिपोर्टिंग देख
कर मेरे मन में कुछ सवाल उठ रहे हैं। ठीक है आप का चैनल सबसे पहले पहुंचा है। तो
आपने ऐसा क्या तीर मार लिया ? हेलीकाप्टर से कौन नहीं पहुँच सकता ? और पहुँच कर आपने
कितनों की जान बचाई ? जिन लाशों की तसवीरों को एक्सक्लूसिव
बता कर टी0वी0 पर दिखा रहें हैं, उनमें से 05 से 10 लाशों की
जिम्मेदार वह भी हैं। क्योंकि जिस विमान के द्वारा उनके क्रू को वहाँ ले जया गया
होगा, अगर उस विमान में उनकी जगह रेसक्यू टीम के सदस्य जा पाते
तो कम से कम वह कुछ लोगों को जिंदा जरूर बचा लेते।
प्यारे देश वाशियों
! उत्तराखंड के लोगों की गलत तस्वीर पेश की जा रही है। कहा जा रहा है कि वहाँ
लोगों को लूटा जा रहा है। 10 का बिस्कुट 100 में, चाय 50 की, आदि आदि। ऐसा
लग रहा है की उत्तराखंड के लोग अमानवीय हैं। प्यारे देश वाशियों ! आप इन खबरों को
अपवाद मानिए। हम पहाड़ी हैं, हमारा जीवट पहाड़ जैसा है। हम
मरना पसंद करेंगे पर किसी को लूट कर अपना पेट नहीं भर सकते। यह हमारा उत्तराखंड ही
है जहां पहाड़ी इलाकों में लोग आज भी अपने घरों में ताला नहीं लगाते हैं। अगर ऐसा
होता तो आज एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी जो हजारों लोग जिंदा बचे हैं उनमे कई काल
के गाल में समा गए होते। उनको खाना-पीना यहाँ के स्थानीय निवाशियों ने ही अधिकांश
को मुफ्त उपलब्ध कराया है। जगह-जगह लोगों ने मुफ्त लंगर लगाए हैं। और बाहर से आए
लोगों को सहारा और ढाढ़स बंधा रहे हैं। जबकि उत्तराखंड के अपने मूल निवासी भी इस
त्रासदी से उतने ही प्रभावित जितने कि
बाहर से आए लोग। उन तक राहत अभी पहुंचनी बाकी है। पर वह अपना धैर्य नहीं खो रहे
हैं। और सब कुछ खोने के बाद भी उत्तेजित नहीं हैं। पहले बाहर से आए लोगों को
सुरक्षित अपने घर पहुँचने देना चाहते हैं। सारे मीडिया व प्रशासन का पूरा ध्यान
बाहर से आए लोगों पर ही है। उनकी अभी कोई खबर नहीं ले रहा है, फिर भी वह चुप हैं। यही है हमारी पहाड़ जैसी जीवटता।
प्यारे देश वाशियों
! उत्तराखंड के लोग मूल रूप से व्यवसाय पसंद हैं भी नहीं। यही कारण है की यहाँ के बाज़ारों
में और चारधाम यात्रा-पथ पर देश के विभिन्न हिस्सों से आकर लोग व्यवसाय कर रहे हैं।
हो सकता है यह काम उन लोगों का हो। ऐसा भी नहीं है की स्थानीय ऐसा कर ही नहीं सकते।
कुछ बुरे लोग हर जगह मौजूद रहते हैं। कुछ लोग त्रासदी के इस मौके को अपने लाभ के लिए
इस्तेमाल कर रहे हों, और बस्तुओं की अधिक कीमतें मांग रहें हों पर ऐसे बहुत कम होंगे। सनसनी को
पत्रकारिता मानने वाले चैनलों व अखबारों से मेरा एक सवाल है कि, ठीक है कुछ लोग इतने बुरे हैं कि त्रासदी के इस दौर में भी लाभ कमाने की सोच
रहें हैं। आप भी तो लाशों की तस्वीरों को एक्सक्लूसिव तस्वीरें दिखा कर टी0आर0पी0 बटोरने
का काम कर रहे हो। आप में और उनमें फर्क क्या है ?
प्यारे देश वाशियों ! दो-चार लुटेरों की करतूतों
को अखबार में पढ़कर व टी0वी0 में देखकर आप हमारे (उत्तराखंडियों) बारे में नकारात्मक धारणा न बनाएँ।
आप सब को नमस्कार। ऐसी त्रासदी फिर कभी न आए।

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