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'नोवेल करना वायरस'..भाग -4

अगर लॉक-डाउन आगे बढ़ता है... .......... लॉक-डाउन अगर आगे बढ़ता है। तो सबसे पहले राहत शिविरों में रह रहे लोगों को उनके घर पहुंचाने की व्यवस्था प्राथमिकता के आधार पर किये जाने की आवश्यकता है। राहत शिविरों में वह लोग रखे गये हैं, जो लॉक-डाउन के बाद अपने घरों को जाने की कोशिश कर रहे थे। समाचार पत्रों व मीडिया में वायरल खबरों से प्राप्त जानकारी के अनुसार यह लोग इन राहत शिविरों में 22 से 31 मार्च के बीच की अवधि से रह रहे हैं। ..... यह अधिकांश राहत शिविर स्कूलों में स्थापित हैं। जिनमें औसतन 50 लोग तो रह ही रहे होंगे। स्कूलों में शौचालयों की संख्या सीमित होती है। अगर कोई नहाना चाहे तो नहाने के लिये उचित व्यवस्था नहीं रहती। नहाने की उचित सुविधा केवल उन विद्यालयों में होती है जो रेजिडेंशियल होते हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिन स्कूलों को राहत शिविरों में बदला गया है वह सभी नॉन-रेजिडेंशियल हैं। सीमित शौचालय होने के कारण इन लोगों को होने वाली कठिनाई को समझा जा सकता है। गर्मियां शुरू हो गयी हैं, स्नानागार नहीं भी हैं, तो यह बाहर खुले में नहा सकते हैं। ऐसा भी सवाल शायद किसी के मन में आ रहा हो। पर...

कोरोना वायरस..भाग-2

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आजकल  COVID -19 से बचाव का कार्य सरकार द्वारा युद्ध स्तर पर चलाया जा रहा है। इस दौरान क्वारेंटीन (QUARANTINE) व आइसोलेशन ( ISOLATION ) शब्द प्रयोग में लाये जा रहे है। सोशल मीडिया में वायरल वीडियोज देखने से पता चल रहा है कि हम 'क्वारेंटीन' व 'आइसोलेशन' को सही से नहीं समझ पा रहे हैं। इस पोस्ट में हम क्वारेंटीन (QUARANTINE) को समझने का प्रयास करेंगे। .... प्रश्न - क्वारेंटीन (QUARANTINE) का क्या अर्थ होता है ? ..... उत्तर- संक्रामक रोगों के मामले में क्वारेंटीन (QUARANTINE) को इस तरह समझा जा सकता है- यदि किसी व्यक्ति में किसी संक्रामक बीमारी के लक्षण भले ही न दिखाई दे रहे हों और वह पूरी तरह स्वस्थ दिख रहा हो, परंतु उसकी जाने-अनजाने किसी संक्रामक रोगी के संपर्क में आने की संभावना रही हो, उनको रोगजनक के *'रोगोद्भवन काल' (इन्क्यूबेशन पीरियड) तक अन्य स्वस्थ व्यक्तियों से अलग रखा जाता है। .... यह दो तरीकों से किया जाता है- किसी व्यक्ति को उसके घर पर ही (*रोगोद्भुवन काल तक) अलग रहने को कहा जा सकता है, इसको 'होम क्वारेंटीन' (HOME QUARANTINE) कहते हैं। ..... या फि...

#कोरोना वायरस.

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आजकल हम सब घर के अंदर बंद हैं। कुछ अपनी मर्जी से और कुछ जबरदस्ती सरकार की मर्जी से। कोरोना वायरस के बारे में टीवी, व्हट्स ऐप, फेसबुक, यूट्यूब पर आप बहुत अधिक देख व पढ़ चुके होंगे। अब पढ़ने व जानने के लिये शायद ही कुछ शेष बचा हो ? आप सोच रहे होंगे कि फिर मैं क्यों लिख रहा हूँ ? .... दरअसल मुझे इस दौरान कुछ मित्रों के फोन आये उनसे बातचीत के दौरान मुझे लगा कि घर के अंदर अचानक बंद होने से, लगातार टीवी और सोसल मीडिया का प्रयोग करने से, लोगों में पैनिक व एंजायटी (डर) पैदा हो रही है। इसलिये मुझे लगा कि इस पर कुछ लिखा जाना चाहिये। इस पोस्ट में मैं बहुत कुछ एकेडमिक बातें नहीं करूँगा। पर साधारण शब्दों में आपको कोरोना वायरस के बारे में जानकारी देने का प्रयास करूंगा। ..... प्रश्न- वायरस (#Virus ) क्या होता है ? ..... विषाणु (वायरस) सजीव और निर्जीव के बीच की कड़ी है। यह न तो पूरी तरह निर्जीव होता है और न ही पूरी तरह सजीव। जब यह पृथ्वी की सतह पर पड़ा होता है, तो इसका व्यवहार अन्य निर्जीव वस्तुओं की तरह ही होता है। परन्तु जब यह किसी जीवित कोशिका में प्रवेश करता है या यूँ कहें जीव के शरीर में प्रवेश करता...

"चाय पर चर्चा"

... भाग-1 ... चाय पर चर्चा का इतिहास काफी पुराना है। अब यह मत मान लीजिएगा कि इस पोस्ट में चाय के गुणों की कोई चर्चा होगी। सिंपल टी, लेमन टी, ग्रीन टी,ब्लैक टी, अदरक टी, तुलसी टी, मसाला टी जैसे प्रकारों की चर्चा भी इसमें नहीं होगी। कभी-कभी शीर्षक से कुछ और भाव आता है और वास्तविक भाव कुछ और होता है। जैसे मंच में डाइस के सामने खड़े और भाषण देते हुये नेता को देखो तो वह बहुत ही ईमानदार नजर आता है। पर जब मंच से नीचे उतरने पर उसे कभी देखो तो शक होता है कि यह वही सज्जन  थे या कोई और हैं। इसलिये इससे पहले पोस्ट आगे बढ़े, आपको आगाह कराना मेरा फर्ज है। पता लगा कि आप चाय की जानकारी लेने के (शीर्षक के भाव के) चक्कर में पूरी पोस्ट पढ़ लो और बाद में निराश हों। जैसे नेता को चुनने के बाद निराश होना पड़ता है। इसलिए इस पोस्ट पर तभी बने रहें जब चाय की जानकारी के शौकीन न हों। इस शीर्षक को आप इस कोण से देखें "चाय की दुकान पर चर्चा"। ... अभी परसों मैं किसी मित्र का इंतजार कर रहा था। मिलने का समय दस बजे निर्धारित हुआ था। पर मित्र भारतीय समयानुसार ग्यारह बजे भी नहीं पहुंचे। क्योंकि भारतीय समय...

ड्रेस ड्रेस ड्रेस ......

वैसे इस मुद्दे पर मेरी राय का कोई महत्व तो नहीं है,पर क्योंकि कुछ मित्र मेरी राय जानना चाहते हैं और इस पर मेरी पोस्ट का भी इंतजार कर रहे हैं। तो मुझे लगा लिख लेता हूँ। ... ड्रेस कोड के संबंध में मेरे मन में कुछ सवाल हैं- 1- ड्रेस क्यों जरूरी होती है ? 2- ड्रेस कोड से शिक्षकों के शिक्षण में क्या कोई अंतर आयेगा ? 3- अचानक सरकार को शिक्षकों के लिये ड्रेस कोड की जरूरत क्यों महसूस हुयी ? 4- सरकार ड्रेस कोड लागू करके किन उद्देश्यों की पूर्ती करना चाहती है ? ... 1- ड्रेस क्यों जरूरी होती है ? -- जहाँ तक मेरा सोचना है ड्रेस की जरूरत समानता के लिये होती है, खासकर विद्यालयों के परिपेक्ष्य में। इसीलिये एक जैसी ड्रेस को यूनिफॉर्म कहते हैं। विद्यालय में बच्चों में अमीरी-गरीबी का भेद न रहे। बच्चों में हीनता की भावना न पनपे । इसलिये यूनिफार्म को लागू किया गया होगा। दूसरा यूनिफार्म बच्चों में अनुसाशन की भावना विकसित करती है। ● अगर इस नजरिये से देखें तो मुझे नहीं लगता कि शिक्षकों को ड्रेस की जरूरत है। क्योंकि लगभग सभी शिक्षकों को उनके पद के वेतनक्रम के अनुसार बराबर सेलरी मिलती है। शिक्षकों में BPL जैस...

क्या वोट देकर सरकार बनाना ही लोकतंत्र है ?

1- आप सोच रहे होंगे कि आज मैं यह क्या लेकर बैठ गया ? ... 2- अखबारों में यह पढ़कर बड़ा दुख हुआ कि एक शिक्षक को मात्र इस बिना पर निलंबित कर दिया कि वह बिना अनुमति DM से मिले थे। ... 3- यह जो कर्मचारी आचार सहिंता बनी है, वह अंग्रेजों के समय की यानी गुलामी की याद दिलाती है। क्योंकि बड़े पदों पर अंग्रेज हुआ करते थे। और छोटे पदों पर हिंदुस्तानी। ... 4- अब एक आम और निम्न हिंदुस्तानी कर्मचारी का बड़े साहब से बिना इजाज़त मिलना कैसे गँवारा किया जा सकता था ? ... 5- वह भी उस दौर में जब बंगलों के बाहर लिखा रहता था कि हिंदुस्तानियों और कुत्तों का अंदर आना मना है। ... 6- तब की परिस्थियाँ और थी। हम एक गुलाम देश थे। आज की परिस्थितयां अलग हैं। ... 7- आज हम एक लोकतांत्रिक देश हैं। किसी छोटे कर्मचारी को बड़े अधिकारी से मिलने से रोकनेे के वर्तमान नियम मेरी राय में लोकतांत्रिक तो नहीं ही हैं ? ... 8- अगर कोई छोटा कर्मचारी किसी कार्य से बिना अनुमति अपने अधिकारी से श्रेणी क्रम में बड़े अधिकारी से मिलता है, तो इससे कौन सा पहाड़ टूट जायेगा ? ... 9- कोई कर्मचारी अगर किसी अधिकारी से मिलने जाता है तो जाहिर है, वह किसी का...

"लिंग-भेद को बढ़ाती शिक्षकों की यूनिफार्म"

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जरा गौर करें ! ... 1- पुलिस की यूनिफार्म पर। ... 2- डॉक्टरों की यूनिफार्म पर। ... 3- वकीलों की यूनिफॉर्म पर। ... 4- आर्मी की यूनिफार्म पर । ... 5- क्या किसी की भी यूनिफार्म का रंग महिला व पुरुषों के लिये अलग-अलग है ? जबाब होगा नहीं। ... 6- यूनिफॉर्म का मतलब यूनिफार्म होता है। जो पुरुष हो या महिला सबके लिये एक जैसी होती है । अगर महिला और पुरुषों की यूनिफार्म का रंग अलग-अलग होगा तो फिर वह "यूनिफार्म" कहाँ कहलायेगी ? ... 7- उत्तराखंड सरकार की शिक्षकों की यूनिफार्म के लिये जारी आदेश मेरी नजर में 'लिंग-भेद' पैदा करने वाला आदेश है। ... 8- और महिलाओं के लिये सलवार-सूट या साड़ी क्यों ? पैंट शर्ट क्यों नहीं ? आप यूनिफार्म का रंग बताइये और कोई महिला क्या पहनेगी ये उस पर छोड़ दो। ... 9- जहाँ यूनिफार्म लागू हैं, वहाँ महिलाओं के लिये सूट या साड़ी जैसी शर्तें नहीं है। यह उनके ऊपर है कि वह किसमें अपने को कंफर्ट पाती हैं। जिससे वह आसानी से अपने कार्य को संपादित कर सकें। ... 10- कुल मिलाकर अगर ड्रेस-कोड लागू करना ही है तो पुरुष हो या महिला दोनों की ड्रेस का रंग एक सा होना चाहिये। आखि...

"भाई जी मेरी ड्यूटी फलाणी जगह लगा देना"

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"भाई जी मेरी ड्यूटी फलाणी जगह लगा देना" 1- जैसे ही बोर्ड परिक्षाओं की तिथि नजदीक आती है,यह डाइलोग यत्र-तत्र सुनायी देने लगता है। 2- बोर्ड परीक्षा 2017 हेतु कक्ष निरीक्षकों की ड्यूटी का कार्यक्रम ब्लॉक स्तर पर गतिमान है। 3- इसमें रसूख वाले शिक्षकों की ड्यूटी उनके अनुसार तय कर दी जाती है। 4- रसूख वालों की भी अलग-अलग श्रेणियां होती हैं।( इस लेख में, मैं जिले स्तर तक की श्रेणियों का जिक्र कर रहा हूँ)। 5- प्राथमिक श्रेणी में वह आते हैं , जिनकी जिला शिक्षा अधिकारी से सीधी पहचान होती है। उनकी सेटिंग जिला शिक्षा अधिकारी की फ्लाइंग टीम में होती है। 6- द्वितीयक श्रेणी में डीईओ माध्यमिक से जान-पहचान वाले आते हैं। और यह उनकी फ्लाइंग टीम का हिस्सा होते हैं। 7- तृतीयक श्रेणी में डीईओ बेसिक से जान -पहचान वाले होते हैं,और उनकी फ्लाइंग टीम के हिस्सा होते हैं। 8- चतुर्थ श्रेणी में डाइट के प्राचार्य की टीम होती है। 9- पंचम श्रेणी में बीइओ की टीम के लोग होते हैं, इनमें ब्लॉक शिक्षक संग़ठन के पदाधिकारी भी कभी-कभी सम्मिलित देखे जा सकते हैं। कभी-कभी सीआरसी भी इस श्रेणी में देखे गये हैं। इस श्...

शिक्षिकों को ग्रामीणों ने रास्ते मे रोका

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सुना है कि ‘’ देहारादून से चकराता कालसी जाने वाले शिक्षिकों को ग्रामीणों ने रास्ते मे रोका ‘’ 1- ठीक है जनता को जागरूक होना ही चाहिए । 2- वास्तव में इतनी दूर प्रतिदिन आना-जाना और फिर पढ़ाना मुश्किल तो है ही। 3- इसमें कोई संदेह नहीं कि वह शिक्षक अपना 100% बच्चों को नहीं दे पाते हैं। 4- यह भी सही है कि शिक्षक को अपने विद्यालय के आस-पास कमरे लेकर रहना चाहिए। व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना भी यही है। पर साथियों और जागरूक जनता थोड़ा रुकें और सोचें कि – 1- आखिर नौकरी इंसान करता क्यों है ? अपने लिए,बच्चों व परिवार के लिये। 2- 20-20 साल से लोग अपने घर,परिवार व बच्चों से दूर दुर्गम में नौकरी कर रहे हैं। इस उम्मीद में कि आज ट्रान्सफर होगा, कल ट्रान्सफर होगा। 3- वर्ष बीतते रहे और वह वहीं जमे हैं। फिर शिक्षकों ने एक हल निकाला कि क्यों न नजदीकी शहर से अप-डाउन किया जाय। 4- कुछ लोग 20-20 ,25-25 साल से सुगम में डटे हैं। उनको देखकर भी तो मन जलता होगा। 5- अब रोज-रोज आने-जाने में जान को जोखिम में डालना हुआ। जान को जोखिम में कोई ऐसे ही नहीं डालता ? 6- जान भले ही रह भी गयी, पर स्वास्थ्य की समस्या तो 100% हो...
“ जनगणना प्रशिक्षण कार्यक्रम में न पहुँचने वाले शिक्षकों पर होगा मुकदमा” 1- करो भाई, मुकदमा करो, जेल डालो, जो करना है करो। 2- जिन अध्यापकों ने आपको कलम पकडनी सिखाई, अक्षरों से आपका परिचय कराया उनको गुरु दक्षिणा भी तो देनी है। 3- पर मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि जिनको अधिकारी, सरकार, समाज सभी पानी पी-पी कर कोसते रहते हैं कि तुम निकम्मे हो,पढ़ाते नहीं हो, अपना काम नहीं करते आदि-आदि । 4- जब यह काम ही नहीं करते तो इन निकम्मों कि ड्यूटी जनगणना में क्यों लगा रहे हो भाई ?

बातों की जलेबी न बनायें

परसों एक प्रिय मित्र का फ़ोन आया,एक लंबे समय बाद। लगभग रात साढ़े बारह बजे। मैंने सोचा मौसम विभाग की सूचना सही हो गयी, जरूर टिहरी में भी कोई आपदा आ गयी । वरना इतनी रात क्यों फ़ोन आएगा । और फ़ोन करने वाले मित्र पोपट लाल की तरह "मिस कॉल" करने के लिए ख्याति प्राप्त हैं। वह आज मिस कॉल नहीं कॉल कर रहे थे ,फिर तो यह कन्फर्म हो गया कि अवश्य उनके क्षेत्र में कोई आपदा आ गयी है। तो उस आपदा की दास्ताँ आप भी सुनिये- "अरे यार सो गए ?" -नहीं, मैं तो क्लास ले रहा हूँ। "क्यों मजाक कर रहा है ?" -  अरे, मजाक तो तुम कर रहे हो।रात के साढे 12 बजे आदमी सोयेगा नहीं तो और क्या करेगा। चल छोड़ बता इतनी रात क्यों फोन किया ? सब कुछ ठीक तो है ? "खाक ठीक है यार तुमने कन्फ्यूज़ कर दिया" - मैंने कन्फ्यूज़ कर दिया ? अरे तुमसे तो कई दिनों से बात भी नहीं हुयी ? तुम कहना क्या चाहते हो ? " अरे ! सरियाल जी की पोस्ट है कि 04 जुलाई तक छुट्टी हैं" -तो इसमें मेरी क्या भूमिका ? तो छुट्टी होगी । " अरे तुमने पोस्ट किया है कि नहीं है, मैं कंफ्यूज हो गया हूँ।" - मैंने कहा कि सरिय...

हड़ताल के बाद

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सम्मानित साथयों, 1- सभी अब हड़ताल के बाद अपने- अपने विद्यालयों में पहुँच गए होंगे। राजकीय शिक्षक संघ को नयी उचाईयों पर पहुचाने के लिए आप सब का बहुत बहुत धन्यवाद। 2- हड़ताल वापस होनी चाहिए थी या नहीं इस पर सबकी अपनी अपनी प्रतिक्रियाएं हैं। 3- ठीक इसी प्रकार आंदोलन की सफलता व असफलता को भी लोग अपने- अपने नजरिये से परिभाषित कर रहे हैं। 4- कई लोग निराश हैं कि यह नहीं मिला वह नहीं मिला आदि आदि। 5- मेरा आप सब संघ से जुड़े सदस्यों से अनुरोध है कि निराश होना उचित नहीं है। 6- पहली बार राजकीय शिक्षक संघ द्वारा उत्तराखंड बनने के बाद इतना विराट आंदोलन किया गया। 7-यह पहली लड़ाई है, आखरी नहीं। 8- ये होना चाहिए था वो होना चाहिए था, आपके सुझावों का स्वागत है, संघ से जुड़े रहिये मीटिंग में आईये। अपने सुझावों को लिखित रूप में पत्र के माध्यम से अपने संघठन की किसी भी शाखा को भेजिए। 9- नेतृत्व के निर्णय का सम्मान करिये। हर नेतृत्व की अपनी सीमाएँ होती हैं। इन सब ने अपनी क्षमता के अनुसार कार्य किया। हो सकता है किसी के लिए कम हो। 10- आप में कई की क्षमताएं ज्यादा हो सकती हैं, आप अपने नेतृत्व से संघ को और आगे ले ...

"वेतन कट गया, अरे मेरा वेतन कट गया.."

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1- आज कल एक नयी फिल्म "हड़ताल" का यह रुदाली गीत सोसल मीडिया में सुपर-डुपर हिट हो रहा है। 2- इस गीत को पहले किसने लिखा इसका ठीक-ठीक किसी को पता नहीं है। 3- और इसके सबसे पहले गायक का भी ठीक-ठीक पता नहीं चल पा रहा है। 4- पर भिभिन्न व्हट्स एप व फेसबुक ग्रुपों में यह लगातार लिखा व गाया जा रहा है। 5- यह गीत ट्रेजरी वालों को कुछ ज्यादा ही पसंद आ रहा है, इसलिए ट्रेजरी वाले इसको अपने-अपने हिसाब से वायरल करने में यू-ट्यूब से ज्यादा भूमिका निभा रहे हैं। 6- इस गीत से ट्रेजरी वाले इतने उत्सुक हैं कि वह अपना नया चैनल "ट्रेजरी-ट्यूब" खोलने वाले हैं। 7- ट्रेजरी वालों ने इस चैनल के रजिस्ट्रेशन हेतु सरकार के समक्ष आवेदन कर दिया है। उनकी कोशिश है कि इसी महीने इसको लॉन्च कर दिया जाय। 8- परन्तु इस चैनल को, शिक्षकों का संघठन लॉन्च नहीं होने दे रहा है। क्योंकि इससे उनकी भावनाएं आहत हो रही हैं। 9- पर अगर यह चैनल लॉन्च होता है, तो कई लोगों के दिल को ठंडक मिलनी निश्चित है। जो सरकारी शिक्षकों को "काला बाखरा" की तरह देखते हैं। 10- जिन पर यह गीत फिल्माया गया है, वह लड़ाई में तो ज...

उत्तराखंड में ट्रांसफर पर

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"जाट मर गया"* देवियों और सज्जनों ! 1- जिनके भी कथित रूप से ट्रांसफर आदेश हुये हैं,उनको बहुत- बहुत सुभकामनाएँ। 2- अगर यह सच साबित हुये तो नए साल 2017 का इससे बेहतर गिफ्ट नहीं हो सकता है। 3- हरियाणा की एक कहावत है " जाट मरे तब जाणों, जब उसकी तेरहवीं हो जाय।" तो अभी केवल जाट के मरने की सूचना मात्र है। 4- शिक्षा विभाग के पिछले अनुभव आपके साथ हैं। इसलिए यह मत सोचना कि मैं आपको डरा रहा हूँ। 5- इसलिये ट्रांसफर की ख़ुशी में पार्टी-शॉर्टी से थोड़ा बच के रहें। 6- माना पार्टी करने को मन हिलोरें मार ही रहा हो, तो यह कहना की यह न्यू ईयर की पार्टी है। भूल से ट्रांसफर की मत कह देना। 7- ट्रांसफर की ख़ुशी होना लाजमी है, पर उस ख़ुशी को चेहरे पर आने से जितना रोक सकें तो रोकें। 8- अब मैं ख़ुशी रोकने को क्यों कह रहा हूँ ? 9- पहला कारण- क्योंकि इस लिस्ट में कुछ साथियों के ट्रांसफर अथिति शिक्षकों की जगह हुए हैं। आप समझ रहे हैं न,मैं क्या कहना चाह रहा हूँ ? 10- दूसरा कारण- कुछ लोग आपकी और हमारी तरह "ऑनलाइन वीर" नहीं होते ( जो 24 घंटे ऑनलाइन रहते हों ), जो "ऑनलाइन ट्रांसफर...

"सर्जिकल स्ट्राइक"

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साथियों, 1- स्कूलों को ISI के ठिकाने समझ कर । 2- मास्टरों को आतंकवादी समझकर, जो हमारे अधिकारी घात लगाकर छापा मारते हैं। 3- अब समझ आया कि वह उनकी तरफ से की गयी "सर्जीकल स्ट्राइक" होती है। 4- उनकी प्लानिंग इतनी पक्की होती है कि सेना की टाइमिंग मिस हो जायेगी पर उनकी टाइमिंग कभी मिस नहीं होती। 5- वह ठीक अगर 09 :45 बजे स्कूल है, तो 09:30 पर पहुँच जाते हैं , जो आतंकवादी लेट हो गया उसको धर दबोचते हैं। (यह अलग बात है कि अपने ऑफिस इतनी जल्दी पहुँचते, वह यदा-कदा ही देखे जाते हैं)। 6- या फिर 3:50 छुट्टी का टाइम है । वह ठीक 3:45 पर स्कूल में पहुँच जायेंगे और जो आतंकवादी शिविर छोड़ देते हैं, उनका नाम पाकिस्तानी सेना में शामिल कर दिया जाता है। 7- उसके बाद बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है, जिसमें पकडे गए आतंकवादियों के नाम उजागर किये जाते हैं। 8- और पूरे प्रान्त को बताया जाता है कि हमने कितने बजे छापा मारा, कैसे- कैसे हमने इस "सर्जीकल स्ट्राइक" को अंजाम दिया। 9- दूसरे दिन पूरे मीडिया जगत में और अभिभावकों में सर्जिकल स्ट्राइक की चर्चा रहती है। 10- उसके कुछ दिनों तक जो डरपोक ...
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*"मेरी पीड़ा"*  1- फोटो को ध्यान से देखें। पहले पूरी खबर पढ़ लें। फिर अंडरलाइन पर ज्यादा गौर करें। 2- अब खबर के उद्देश्य पर गौर करें ? 3- पातरकार मित्र क्या सन्देश दे रहें हैं ? 4- प्रथम दृष्टया यह लगता है कि यह छुट्टियों में अपने कार्य के प्रति समर्पित अथिति शिक्षकों को समाज के सामने लाना चाहते हैं। 5- मीडिया का काम ही यह है, उसे ऐसा करना चाहिए। 6- पर खबर को ध्यान से पढ़ने पर पता चलता है कि यह "स्थायी शिक्षक" विरोधी मानसिकता के कारण लिखी खबर है। 7- इस बात को लिखने क्या मतलब हुआ कि अथिति शिक्षक बच्चों को पढ़ा रहे हैं ,"जबकि स्थाई शिक्षक छुट्टी जा रखे हैं।" इससे ऐसा प्रतीत होता है कि स्थाई शिक्षकों ने छुट्टी जाकर गुनाह कर दिया। और उन्हें छात्रों के हित की कोई चिंता नहीं है। 8- आखिर मीडिया वाले समाज को क्या सन्देश देना चाहते हैं ? कि स्थाई शिक्षक बच्चों के प्रति समर्पित नहीं हैं ? तभी तो कुकुरमुत्तों की तरह प्राइवेट स्कूल खुल रहे हैं। 9- और उन स्कूलों में हजारों अप्रशिक्षित शिक्षक कार्य कर रहे हैं। या यूँ कहें कि अपना शोषण करवा रहे हैं।  10- क्य...

विदेशी महिला और उसकी बच्ची

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उत्तराखंड में 15 से 17 जून 2013 के बीच बादलों के फटने से जो आपदा आयी है वह कितनी विनाशकरी है , इसका आकलन करने में अभी कई महीने लगेंगे।       इसी दौरान प्रभावितों के लिए लगाए गए राहत शिवरों (ऋषिकेश) को देखने का मौका मिला जगह-जगह शिविर लगाकर , लोग निशुल्क लोगों को खाद्य सामग्री वितरित कर रहे थे। यह सब देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा। मुझे लगा कि आज भी इंसानियत जिंदा है। इसी दौरान मैंने देखा कि एक विदेशी महिला और उसकी लगभग 9-10 साल की बच्ची भी अपने बैग में बिस्कुट व पानी की थैलियाँ लेकर बसों में जाकर प्रभावितों को वितरित कर रही थी। देखकर लगा कि इंसानियत जमीन में खींची रेखाओं से ऊपर की चीज है।           फिर मेरे मन में एक खयाल आया कि यह इंसानियत हमारे मन में हजारों लोगों के जान गवाने के बाद ही क्यों जिंदा होती है ? सामान्य दिनों में यह मृतप्राय: क्यों रहती है ? हमारे देश व विश्व में सैकड़ों बच्चे व लोग खाना न मिलने के कारण कुपोषण के शिकार हैं , जबकि सैकड़ों जरूरत से ज्यादा खाने से कुपोषण के शिकार हैं। इस असंतुलन क...

उत्तराखंड की त्रासदी - 01

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प्रिय ,       देशवाशियों उत्तराखंड की त्रासदी आप सभी टी0वी0 में देख ही रहे होंगे। और इस त्रासदी की रिपोर्टिंग भी देख , सुन व पढ़ भी रहे होंगे। टी0वी0 पत्रकार व एंकर गला फाड़-फाड़ कर चिल्ला रहे हैं की देखिये हमारा चैनल सबसे पहले केदार नाथ पहुंचा है और आपको एक्सक्लूसिव तस्वीरें दिखा रहा है। लगभग सभी सबसे पहले पहुँचने का दावा कर रहे हैं।       ऐसी रिपोर्टिंग देख कर मेरे मन में कुछ सवाल उठ रहे हैं। ठीक है आप का चैनल सबसे पहले पहुंचा है। तो आपने ऐसा क्या तीर मार लिया ? हेलीकाप्टर से कौन नहीं पहुँच सकता ? और पहुँच कर आपने कितनों की जान बचाई ? जिन लाशों की तसवीरों को एक्सक्लूसिव बता कर टी0वी0 पर दिखा रहें हैं , उनमें से 05 से 10 लाशों की जिम्मेदार वह भी हैं। क्योंकि जिस विमान के द्वारा उनके क्रू को वहाँ ले जया गया होगा , अगर उस विमान में उनकी जगह रेसक्यू टीम के सदस्य जा पाते तो कम से कम वह कुछ लोगों को जिंदा जरूर बचा लेते।       प्यारे देश वाशियों ! उत्तराखंड के लोगों की गलत तस्वीर पेश की जा रही है। कहा...

स्कूल और प्रार्थना

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जब मैं स्वयं एक विदद्यार्थी था।  जब हम हर दिन सुबह प्रार्थना सभा में जाते थे तो , मेरे मन में यह सवाल आता था कि इस प्रार्थना सभा का उद्देश्य क्या है ? प्रार्थना सभा में प्रार्थना , राष्ट्रगान , राष्ट्रगीत , प्रतिज्ञा करवाने का उद्देश्य क्या है ? जब थोड़ा समझने लायक हुआ , तर्क करने की क्षमता विकसित हुई , तो अनुमान लगाया कि प्रार्थना का उद्देश्य भगवान को याद करना , उससे यह प्रार्थना करना कि वह हमें सत्य और अच्छाई के रास्ते पर ले जाये आदि आदि। मैंने पाया कि जब हम मंदिर या घर में पूजाघर के सामने प्रार्थना करते हैं तो हमारी मन की भावनाएं अलग होती हैं। जब पूजाघर या मंदिर में प्रार्थना के लिए खड़े होते हैं तो हाथ-पैर धुलकर जाते हैं। हमारे मन में एक विश्वास व श्रद्धा की भावना होती है। पर वही प्रार्थना जब हम स्कूल के मैदान में करते हैं , तो हमारे मन में वैसी श्रद्धा उत्पन्न नहीं हो पाती। हम प्रार्थना के नाम पर मात्र औपचारिकता निभा रहे होते हैं। स्कूल के मैदान में खड़े प्रार्थना कर रहे बच्चे शायद ही जानते होंगे की वह क्यों और किसलिए यह सब कर रहे हैं। स्कूल के मैदानों ...

अध्यापक का मूल्यांकन उसके रिज़ल्ट से करना कहाँ तक उचित है

सम्मानित साथियों ! आज फेसबुक पर एक पोस्ट पढ़ी , जिसमें कृपांक का लाभ अध्यापक को मिलने की बात कही गई है। और हमारे संघ के नेता इसको अपनी जीत के रूप में प्रचारित कर रहे हैं। हो सकता है कुछ साथियों को यह अच्छा भी लगा हो। परन्तु मेरा मत तो यह है कि शिक्षक के कार्य का मूल्यांकन उसके परीक्षा परिणाम से करना ही गलत है । कुछ लोग यह तर्क देते हैं की अगर शिक्षक से उसका रिज़ल्ट मांगना छोड़ दिया जाय तो वह पढ़ाएगा नहीं , मेरा इस विभाग में दस साल का अनुभव है - जो शिक्षक अपना काम नहीं कर रहे , उनका कुछ भी कर लो वह नहीं ही करेंगे। आप उनसे रिज़ल्ट मांगोगे , वह दूसरे तरीके अपनाएँगे। अपने आस पास हम नजर दौड़ाये तो पाएंगे कई शिक्षक जो बच्चों के साथ दिन रात एक कर देते हैं उनका परीक्षा परिणाम अक्सर संतोषजनक नहीं रहता है। और कुछ का रिज़ल्ट बिना कुछ खास किए भी अच्छा रहता है। कुछ लोग अच्छे रिज़ल्ट के लिए नकल भी करवाते हैं। अगर नकल आज भी बद्दश्तूर जारी है तो इसमें एक कारण अध्यापकों से उनका रिज़ल्ट मांगा जाना भी है ...सरकार द्वारा अब शिक्षा को फुटबाल और हॉकी का खेल बना दिया गया है। जिस शिक्षक का रिज़ल्ट...