"चाय पर चर्चा"
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भाग-1
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चाय पर चर्चा का इतिहास काफी पुराना है। अब यह मत मान लीजिएगा कि इस पोस्ट में चाय के गुणों की कोई चर्चा होगी। सिंपल टी, लेमन टी, ग्रीन टी,ब्लैक टी, अदरक टी, तुलसी टी, मसाला टी जैसे प्रकारों की चर्चा भी इसमें नहीं होगी। कभी-कभी शीर्षक से कुछ और भाव आता है और वास्तविक भाव कुछ और होता है। जैसे मंच में डाइस के सामने खड़े और भाषण देते हुये नेता को देखो तो वह बहुत ही ईमानदार नजर आता है। पर जब मंच से नीचे उतरने पर उसे कभी देखो तो शक होता है कि यह वही सज्जन थे या कोई और हैं। इसलिये इससे पहले पोस्ट आगे बढ़े, आपको आगाह कराना मेरा फर्ज है। पता लगा कि आप चाय की जानकारी लेने के (शीर्षक के भाव के) चक्कर में पूरी पोस्ट पढ़ लो और बाद में निराश हों। जैसे नेता को चुनने के बाद निराश होना पड़ता है। इसलिए इस पोस्ट पर तभी बने रहें जब चाय की जानकारी के शौकीन न हों। इस शीर्षक को आप इस कोण से देखें "चाय की दुकान पर चर्चा"।
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अभी परसों मैं किसी मित्र का इंतजार कर रहा था। मिलने का समय दस बजे निर्धारित हुआ था। पर मित्र भारतीय समयानुसार ग्यारह बजे भी नहीं पहुंचे। क्योंकि भारतीय समयानुसार दस बजे को ग्यारह बजे ही सामान्य रूप से माना जाता है। कहीं-कहीं इस समय में आधे से एक घण्टे का और अंतर देखने को मिल सकता है। अगर आप अपने स्थानीय भारतीय समय से अपनी घड़ी मिलाना चाहते हो, तो उसका मैं एक बेहतर तरीका बता सकता हूँ। जिस दिन आपके शहर में किसी मंत्री जी का कार्यक्रम हो। आप पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं से पता करो, कि नेता जी कितने बजे आयेंगे। माना उन्होंने दो बजे का समय बताया। तो आप दो बजे सभास्थल पर पहुंच जांय। और जब नेता जी सभास्थल पहुँचें, माना वह चार बजे पहुंचते हैं, तो अपने घड़ी में समय मिला लें। वही स्थानीय भारतीय मानक समय कहलायेगा। पर कोई गाँव वाले मेरी पोस्ट पढ़ रहे हों, तो वह अपने स्थानीय भारतीय समय को कैसे ज्ञात करें ? क्योंकि वहाँ मंत्री जी का कोई कार्यक्रम तो कभी होता ही नहीं है। इसके लिये आपको मेरी अगली पोस्ट का इंतजार करना पड़ेगा। क्योंकि पहले शहर का ( शिक्षा विभाग वाले यदि मेरी पोस्ट पढ़ रहे हों तो "सुगम" का ) विकास जरूरी है। इसलिये उनको बता दिया। गाँव का विकास शहर से पहले हो जायेगा तो दुनिया में हमारी क्या रेपो रह जायेगी ?
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ग्यारह बजे तक तो मैं ठीक-ठाक अपनी भावनाओं पर नियंत्रण करने में सफल रहा। पर उसके बाद मेरे शरीर के रसायन उछल-कूद करने लगे। और बेचैनी बढ़ने लगी। आपने कभी किसी का इंतजार किया है? आप की मुस्कराहट बता रही है कि आप भी इंतजार करने की इस प्रकार की प्रक्रिया से गुजर चुके हो। फिर तो आप मेरी स्थिति को समझ गये हो कि इंतजार कितना कठिन होता है।
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( जारी.....)
अभी परसों मैं किसी मित्र का इंतजार कर रहा था। मिलने का समय दस बजे निर्धारित हुआ था। पर मित्र भारतीय समयानुसार ग्यारह बजे भी नहीं पहुंचे। क्योंकि भारतीय समयानुसार दस बजे को ग्यारह बजे ही सामान्य रूप से माना जाता है। कहीं-कहीं इस समय में आधे से एक घण्टे का और अंतर देखने को मिल सकता है। अगर आप अपने स्थानीय भारतीय समय से अपनी घड़ी मिलाना चाहते हो, तो उसका मैं एक बेहतर तरीका बता सकता हूँ। जिस दिन आपके शहर में किसी मंत्री जी का कार्यक्रम हो। आप पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं से पता करो, कि नेता जी कितने बजे आयेंगे। माना उन्होंने दो बजे का समय बताया। तो आप दो बजे सभास्थल पर पहुंच जांय। और जब नेता जी सभास्थल पहुँचें, माना वह चार बजे पहुंचते हैं, तो अपने घड़ी में समय मिला लें। वही स्थानीय भारतीय मानक समय कहलायेगा। पर कोई गाँव वाले मेरी पोस्ट पढ़ रहे हों, तो वह अपने स्थानीय भारतीय समय को कैसे ज्ञात करें ? क्योंकि वहाँ मंत्री जी का कोई कार्यक्रम तो कभी होता ही नहीं है। इसके लिये आपको मेरी अगली पोस्ट का इंतजार करना पड़ेगा। क्योंकि पहले शहर का ( शिक्षा विभाग वाले यदि मेरी पोस्ट पढ़ रहे हों तो "सुगम" का ) विकास जरूरी है। इसलिये उनको बता दिया। गाँव का विकास शहर से पहले हो जायेगा तो दुनिया में हमारी क्या रेपो रह जायेगी ?
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ग्यारह बजे तक तो मैं ठीक-ठाक अपनी भावनाओं पर नियंत्रण करने में सफल रहा। पर उसके बाद मेरे शरीर के रसायन उछल-कूद करने लगे। और बेचैनी बढ़ने लगी। आपने कभी किसी का इंतजार किया है? आप की मुस्कराहट बता रही है कि आप भी इंतजार करने की इस प्रकार की प्रक्रिया से गुजर चुके हो। फिर तो आप मेरी स्थिति को समझ गये हो कि इंतजार कितना कठिन होता है।
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( जारी.....)
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