स्कूल और प्रार्थना
जब मैं
स्वयं एक विदद्यार्थी था। जब हम हर दिन सुबह प्रार्थना सभा में जाते थे तो,
मेरे मन में यह सवाल आता था कि इस प्रार्थना सभा का उद्देश्य क्या है? प्रार्थना सभा में प्रार्थना, राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, प्रतिज्ञा करवाने का उद्देश्य क्या है?
जब थोड़ा समझने
लायक हुआ, तर्क
करने की क्षमता विकसित हुई, तो अनुमान लगाया कि प्रार्थना का
उद्देश्य भगवान को याद करना, उससे यह प्रार्थना करना कि वह
हमें सत्य और अच्छाई के रास्ते पर ले जाये आदि आदि।
मैंने
पाया कि जब हम मंदिर या घर में पूजाघर के सामने प्रार्थना करते हैं तो हमारी मन की
भावनाएं अलग होती हैं। जब पूजाघर या मंदिर में प्रार्थना के लिए खड़े होते हैं तो
हाथ-पैर धुलकर जाते हैं। हमारे मन में एक विश्वास व श्रद्धा की भावना होती है। पर
वही प्रार्थना जब हम स्कूल के मैदान में करते हैं, तो हमारे मन में वैसी श्रद्धा उत्पन्न नहीं हो
पाती। हम प्रार्थना के नाम पर मात्र औपचारिकता निभा रहे होते हैं। स्कूल के मैदान में
खड़े प्रार्थना कर रहे बच्चे शायद ही जानते होंगे की वह क्यों और किसलिए यह सब कर रहे
हैं। स्कूल के मैदानों में बिना श्रद्धा व विश्वास के यह प्रक्रिया लगातार चलते रहने
के कारण अपना मूल अर्थ व उद्देश्य खो गयी है। बच्चों और अध्यापकों दोनों के लिए यह
मात्र औपचारिकता रह गयी है। तो क्या प्रार्थना को प्रार्थना सभा से हटा देना चाहिए? जब इस सवाल को मैंने कुछ मित्रों के सामने रखा तो कई का मानना था कि हाँ हटा
देना चाहिए। कुछ का मानना था कि भगवान! जिसका अस्तित्व ही नहीं है, फिर यह प्रार्थना का खेल क्यों?
इस संबंध में मेरा मत यह है
कि यदि प्रार्थना को प्रार्थना सभा से हटा दिया जायेगा तो उसकी आत्मा ही समाप्त हो
जायेगी। प्रार्थना के नाम पर ही तो प्रार्थना सभा है। अगर भगवान के अस्तित्व को पूरी
तरह स्वीकार नहीं किया जा सकता, उसी तरह उसे पूरी तरह ख़ारिज भी नहीं किया जा सकता। कुछ न कुछ अदृश्य
शक्ति तो है जो इस संसार को चला रही है। अब इसे भगवान कहो या गॉड या प्रकृति या कुछ
और... आपकी मर्जी। हाँ अध्यापकों व विद्यालयों को प्रार्थना को औपचारिक होने से बचाना
चाहिए और उनके मन में वही श्रद्धा व विश्वास उत्पन्न करने कि आवश्यकता है जो उनके मन
में किसी मंदिर में प्रार्थना करते समय होती हैं।

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