विदेशी महिला और उसकी बच्ची



उत्तराखंड में 15 से 17 जून 2013 के बीच बादलों के फटने से जो आपदा आयी है वह कितनी विनाशकरी है, इसका आकलन करने में अभी कई महीने लगेंगे।


      इसी दौरान प्रभावितों के लिए लगाए गए राहत शिवरों (ऋषिकेश) को देखने का मौका मिला जगह-जगह शिविर लगाकर, लोग निशुल्क लोगों को खाद्य सामग्री वितरित कर रहे थे। यह सब देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा। मुझे लगा कि आज भी इंसानियत जिंदा है। इसी दौरान मैंने देखा कि एक विदेशी महिला और उसकी लगभग 9-10 साल की बच्ची भी अपने बैग में बिस्कुट व पानी की थैलियाँ लेकर बसों में जाकर प्रभावितों को वितरित कर रही थी। देखकर लगा कि इंसानियत जमीन में खींची रेखाओं से ऊपर की चीज है।

     
    फिर मेरे मन में एक खयाल आया कि यह इंसानियत हमारे मन में हजारों लोगों के जान गवाने के बाद ही क्यों जिंदा होती है ? सामान्य दिनों में यह मृतप्राय: क्यों रहती है ? हमारे देश व विश्व में सैकड़ों बच्चे व लोग खाना न मिलने के कारण कुपोषण के शिकार हैं, जबकि सैकड़ों जरूरत से ज्यादा खाने से कुपोषण के शिकार हैं। इस असंतुलन को इंसानियत ही दूर कर सकती है। काश ! कि इंसानियत हमेशा के लिए जिंदा हो जाती। इंसानियत क्या तुम हमेशा के लिए जिंदा रहोगी ?

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