अध्यापक का मूल्यांकन उसके रिज़ल्ट से करना कहाँ तक उचित है


सम्मानित साथियों !
आज फेसबुक पर एक पोस्ट पढ़ी, जिसमें कृपांक का लाभ अध्यापक को मिलने की बात कही गई है। और हमारे संघ के नेता इसको अपनी जीत के रूप में प्रचारित कर रहे हैं। हो सकता है कुछ साथियों को यह अच्छा भी लगा हो। परन्तु मेरा मत तो यह है कि शिक्षक के कार्य का मूल्यांकन उसके परीक्षा परिणाम से करना ही गलत है। कुछ लोग यह तर्क देते हैं की अगर शिक्षक से उसका रिज़ल्ट मांगना छोड़ दिया जाय तो वह पढ़ाएगा नहीं, मेरा इस विभाग में दस साल का अनुभव है-जो शिक्षक अपना काम नहीं कर रहे,उनका कुछ भी कर लो वह नहीं ही करेंगे। आप उनसे रिज़ल्ट मांगोगे, वह दूसरे तरीके अपनाएँगे।

अपने आस पास हम नजर दौड़ाये तो पाएंगे कई शिक्षक जो बच्चों के साथ दिन रात एक कर देते हैं उनका परीक्षा परिणाम अक्सर संतोषजनक नहीं रहता है। और कुछ का रिज़ल्ट बिना कुछ खास किए भी अच्छा रहता है। कुछ लोग अच्छे रिज़ल्ट के लिए नकल भी करवाते हैं। अगर नकल आज भी बद्दश्तूर जारी है तो इसमें एक कारण अध्यापकों से उनका रिज़ल्ट मांगा जाना भी है...सरकार द्वारा अब शिक्षा को फुटबाल और हॉकी का खेल बना दिया गया है। जिस शिक्षक का रिज़ल्ट 90% से ऊपर उसे ग्रीन कार्ड जिसका 80% से नीचे उसे रेड कार्ड। क्या बॉल को हिट करना और बच्चों को पढ़ाना एक जैसा कार्य है?

जरा सोचो ! जब दिन रात मेहनत करने वाला शिक्षक यह देखता है उसके साथी को बिना कुछ किए ग्रीन कार्ड मिल गया और उसे इतनी मेहनत के बाद भी रेड कार्ड मिला है, उसके दिल पर क्या बीतती होगी...? एक निक्कमे को पुरस्कार देने से शिक्षा में कोई सुधार नहीं होगा, पर एक मेहनतकश शिक्षक की हताशा शिक्षा व्यवस्था पर बहुत अधिक प्रभाव डालती है। पुरष्कार और सम्मान तभी तक सही हैं जब तक वह योग्य को मिलें। विगत में मिले शिक्षक पुरस्कारों में हुये विवाद बहुत कुछ कह जाते हैं। जहाँ तक मुझे लगता है जो वास्तव में कार्य करने वाले लोग हैं,वह शायद ही पुरस्कार के लिए कार्य करते होंगे।

अब तो ट्रान्सफर में भी रिज़ल्ट की भूमिका को महत्व दिया जा रहा है। मेरा एक मित्र सुगम मे कार्यरत है, वह मात्र इसलिए नकल करवाने के लिए मजबूर है की अगर रिज़ल्ट सही नहीं रहा तो दुर्गम में पटक दिया जायेगा। इसका मतलब दुर्गम में काम करना सजा है। पता नहीं ऐसी नीतियाँ कौन तैयार करता है? इससे शिक्षा का कैसे और क्या भला होगा, समझ से परे है।

आर0टी0ई0 क़ानून ( इस पर फिर कभी चर्चा करूंगा ) ने  प्राथमिक व जूनियर के शिक्षको को तो रिज़ल्ट से मुक्त कर दिया पर माध्यमिक स्तर के शिक्षकों मे रिज़ल्ट का एक डर पैदा कर दिया। क्या यह माध्यमिक के शिक्षकों के साथ भेद-भाव नहीं है? ऐसे में शिक्षकों का यह डर जायज भी है कि जब कक्षा 08 तक किसी को फ़ेल नहीं करना है तो फिर उसके बाद उनसे अगली कक्षाओं में रिज़ल्ट मांगा जाना कहाँ तक उचित है...? क्या किसी शिक्षक का मूल्यांकन मात्र उसके विद्यार्थियों द्वारा लाये गए मार्क्स या ग्रेड द्वारा किया जाना उचित होगा...? ऐसा लगता है संघ के पदाधिकारी इसी विचारधारा के साथ हैं। अगर संघ के पदाधिकारी सरकार से शिक्षक का मूल्यांकन उसके रिज़ल्ट के आधार पर न करने के लिए राजी कर पाते तो निश्चित ही वह बधाई के पात्र होते।
            
                                                                                                       (यह लेख उत्तराखंड के प्रपेक्ष्य में है)

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