प्रांतीय अधिवेशन और पठन-पाठन- भाग-03


...
"मैं धारचूला से आया हूँ, मैं भी आपकी तरह सम्मेलन में आया हूँ।"
अब वह दोनों थोड़ा सहज हुये। और हाथ मिलाकर अपना परिचय दिया।
"मैं अवनीश, उत्तरकाशी से"
"मैं सुशील उत्तरकाशी से"
अब हम तीनों एक साथ बैठ गये। चाय आ गयी और चाय के साथ बातचीत में लग गये।
"आप धारचूला कब से हैं ?"- सुशील ने मुझे पूछा।
"उन्नीस साल से, 1998 की नियुक्त है मेरी।"
"आप दोनों को कितने साल हुये अभी उत्तरकाशी में ?"- मैंने पूछा।
"मुझे ग्यारह साल हो गये, 2006 की नियुक्ति है मेरी।
इनको अभी दो साल ही हुये हैं। इनको भी हो ही जायेंगे, ग्यारह साल एक दिन। आपको उन्नीस साल हो गये। इस बात को आपसे बेहतर कौन जान सकता है।"- सुशील ने जबाब दिया।
"नहीं, मुझसे ज्यादा सालों वाले भी हैं, वह और बेहतर जानते होंगे।"
हम तीनों इस बात पर एक साथ हंस दिये।
"आपके यहाँ से कितने लोग आये हैं ?"- अवनीश ने मुझसे पूछा।
"दो। पर वोट एक का है। मैंने भी वहांनिदेशक का आदेश रास्ते में देखा। मैं तो वापस लौट रहा था सोचा चलता ही हूँ।"
"हमारे यहाँ से वोट दो का है, पर आये हम चार हैं। हम चारों का घर हरिद्वार व रुड़की है। हमने सोचा कि सम्मेलन में भी शामिल हो लेंगे और घर भी हो लेंगे। चौदह सीएल में तो आणा-जाणा ही हो पाये जी। जब भी घर आना होता है जी एक सीएल आणे में खराब करो, एक जाणे में । फिर दो दिन घर रहो तो चार सीएल तो लग ही जाती हैं।अगर कोई काम पड़ गया, तो आधी सीएल तो एक ही बार में खत्म हो जावें जी। अगर कभी गजीटेड छुट्टियों के साथ जोड़ना चाहो,तो कभी कोई छुट्टी कैंसिल हो जा,कभी कोई। इस दिन अलाणा दिवस मनाना है, उस दिन फ़लाणा दिवस मनाना है। इतनी दूर पड़े हैं, सोचा कि दोनों काम हो जावेंगे जी।पर ससुरा ई आदेश ने दिमाग खराब कर दिया जी।"- अवनीश ने कहा।
मेरे मन में आया कि अवनीश को बता दूं कि भाई मुझे तो आने जाने के लिये चार सीएल की जरूरत पड़ती है। पर मैंने उसके दुःख को ही बड़ा रहने दिया।


"यार भाई साहब, ई आदेश का क्या होगा ?"- सुशील ने मुझसे सवाल किया।
"इस बारे में मैं क्या कह सकता हूँ ?"
"मुझे वापस जाना चाहिये की नहीं ?"
"वापस जाने और न जाने का निर्णय तो आपका व्यक्तिगत है। पर मेरी सलाह तो ये है कि जब आ ही गये तो वापस मत जाइए।"
"अगर कुछ कार्यवाही हो गयी तो ? संगठन की स्थिति तो आप देख ही रहे हो,काफी खराब है ?"
"स्थिति संगठन की नहीं, हमारी खराब है ? हमारा संगठन के प्रति विश्वास कमजोर है। हमारे पदाधिकारियों ने कभी इस दिशा में सोचा नहीं ? एक आम शिक्षक का विश्वास संघ के प्रति कैसे मजबूत हो ? इस दिशा में कोई कार्य करने को तैयार नहीं है। जिस संगठन के सदस्य आंदोलनों और सम्मेलनों में जाने से डरेंगे। आंदोलनों और सम्मेलनों में केवल छुट्टी के लिए प्रतिभाग करेंगे, उसकी यही स्थिति तो होगी ? वह भी तब,जब छुट्टी का स्पष्ट आदेश है। आप ही बताओ क्या कार्यवाही होगी ?"
"कुछ भी।"
"देखो अपने आपको इस तरह समझाओ कि फांसी तो लगेगी नहीं, नौकरी भी जायेगी नहीं। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा ? छुट्टियां कटेंगी। अब अगर हम छुट्टियों के कटने से डर रहे हैं, तो फिर क्या कहा जा सकता है ?
आपका तो घर भी पास में ही है। सुबह आकर शाम को घर जा सकते हो। छुट्टी कटेगी भी तो कोई नुकसान नहीं। मेरी सोचो ? मैं कितनी दूर से आया हूँ।"
"पर भाई साहब हमने तो अधिवेशन अवकाश की एप्लिकेशन छोड़ी है,सीएल की नहीं ? कोई कार्यवाही तो नहीं होगी न ?" सुशील जी अभी भी संतुष्ट नहीं हो पा रहे थे।
"तो क्या हुआ ? हम राष्ट्रद्रोह या राज्यद्रोह में शामिल होने नहीं आये हैं?अधिवेशन हमारे सम्मान का प्रतीक है।हम सब ने विधिवत ढंग से मुख्यालय छोड़ा है,और यहांनिदेशक के आदेश के आधार पर छोड़ा है। यहांनिदेशक भी हमारे विभाग के ही हैं। वहांनिदेशक जी का आदेश तब आया जब हम पहुंच गये हैं। वैसे भी जिसका सदस्यता शुल्क जमा है, वह राजकीय शिक्षक संघ का वैध सदस्य है। संघ के संविधान के अनुसार, वैध सदस्य संघ के अधिवेशनों में प्रतिभाग कर सकते हैं और संघ को सरकार ने ही मान्यता दी है। कोई भी अधिकारी यह कभी नहीं चाहेगा कि संगठन मजबूत हों। वहांनिदेशक जी के आदेश को इसी परिपेक्ष्य में देखने की जरूरत है। आम तौर पर वहांनिदेशक हायार्की के अनुसार यहांनिदेशक को आदेश करते हैं। पर उन्होंने सीधे जिले के तहांअधिकारियों को आदेश किये। इससे मनसा समझी जा सकती है।

....
(जारी...)

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