चाय पर चर्चा-प्रांतीय अधिवेशन ......भाग-10



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मैंने घड़ी देखी तो सुबह के नौ बजे रहे थे। कल रेलवे स्टेशन से छूटने के बाद, छूटना ही हुआ, मैं सीधे होटल वापस आया और जल्दी सो गया था। पर फिर भी नींद देर में खुली। अच्छा ही हुआ कि सारी थकान मिट गई थी। मैं आज का पूरा दिन ताजगी के साथ रह सकता हूँ। मैंने होटल के रिसेप्शन में चाय के लिये फोन लगाया। और फिर बाथरूम में जाकर गीजर ऑन कर दिया।
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नहा-धोकर और नाश्ता करके मैं लक्ष्मण विद्यालय की तरफ चल दिया। इस बार मेरी रेलवे स्टेशन के अंदर से जाने की हिम्मत नहीं हुयी। पता लगा कि कहीं किसी ने फिर पकड़ दिया तो ? मैंने स्टेशन के बाहर से लोगों को पटरी के पार जाते देखा तो मैं भी उनके पीछे-पीछे हो लिया। जब मैं रेलवे कॉलोनी की गलियों से होते हुए मुख्य सड़क में पहुंच गया, एक बार मैंने फिर कन्फर्म करने के लिये किसी राहगीर से पूछा। जबाब मिला कि आप सही रास्ते पर हो, आगे चलते रहो लेफ्ट साइड में आपको लक्ष्मण विद्यालय का बोर्ड दिख जायेगा। मैं चलता रहा और लेफ्ट साइड देखता रहा, मेरे साथ-साथ लेफ्ट साइड में एक गंदा नाला भी बहता हुआ चल रहा था। मैं थोड़ी ही दूर चला था कि मुझे एक दो आदमी उस गंदे नाले में कुछ धुलते दिखाई दिये। एक बार को मुझे यकीन नहीं हुआ कि इतने गंदे और काले से पानी में भला कोई क्या धुल सकता है ? जब मैं पास गया तो देखा कि वह लोग खेत से ताजी मूली, गाजर निकाल कर लाये थे और उनको इस गंदे पानी में धुल रहे थे। यह सब देखने के बाद मुझे अजीब सा होने लगा, मैं ज्यादा देर खड़ा रहता तो उल्टी कर देता। यह सब देखने के बाद कमसे कम एक दो महीने तक मैं मूली-गाजर तो नहीं ही खा पाऊँगा।
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मेरा मन उस गंदे पानी और मूली,गाजर में ही उलझा रहता। पर तब तक मेरी नजर बड़े-बड़े होर्डिंग्स पर पड़ गयी। होर्डिंग्स पढ़े तो वह तो हमारे ही चुनाव लड़ने वाले शिक्षक प्रतिनिधियों के थे। आगे बढ़ा तो पोस्टर, बैनरों की भरमार थी। पोस्टर बैनर इतने थे कि कोई भी उनको पढ़ने की जहमत नहीं उठा सकता था। मुझे वह बैनर व्हट्स ऐप में गुड-मॉर्निंग व इवनिंग के मैसेजों की तरह लगे जिनको लोग बिना पढ़े ही डिलीट कर देते हैं। उन पोस्टर बैनरों से लग गया कि मैं अपनी मंजिल के पास पहुंच गया हूँ। पोस्टर बैनरों के बीच मैं लक्ष्मण विद्यालय के बोर्ड को ढूंढने लगा। पर वह कहीं नजर नहीं आ रहा था। सड़क में लोगों की भारी भीड़ देखकर मुझे लगा कि बाहर सड़क में कुछ हो रहा है क्या ? पर ऐसा कुछ नहीं था पुलिस वाले, आने वाले वाहनों को सड़क से हटवाने में लगे थे। 
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बड़ी मुश्किल से मैं गेट को ढूंढ कर अंदर दाखिल हुआ। अंदर और बाहर की भीड़ देखकर मैं चकित था कि 'वहांनिदेशक' के आदेश का कोई असर नजर नहीं आ रहा था। मैं अंदर किनारे की एक कुर्सी में बैठ गया। सम्मेलन में भारी भीड़ की उपस्थिति मुझे संगठन के हित में लगी। पर जो बैनर-पोस्टरों की बाढ़ थी, वह संगठन हित में नहीं लगी। समझ नहीं आया कि यह शिक्षक संगठन का चुनाव है कि कोई आम राजनीतिक चुनाव ? 
शिक्षकों का चुनाव-प्रचार अन्य संगठनों व आम राजनीतिक चुनाव-प्रचार से अलग दिखने चाहिये। होना यह चाहिये कि लोग चुनाव-प्रचार के तरीके हम से सीखते, पर हो उल्टा रहा है हम लोगों से सीख रहे हैं। हमारे प्रचार के तरीके व आम चुनावों के प्रचार के तरीके में मुझे कोई भिन्नता नहीं दिखाई देती। वही पीना-पिलाना, जातिवाद, संवर्गवाद, क्षेत्रवाद, वैसे ही बैनर पोस्टर अलग क्या है ? 
बैनर-पोस्टरों को देखकर मुझे लग रहा था कि इस पर भी संघ के स्तर पर एक अचार संहिता की जरूरत है।

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