चाय पर चर्चा-प्रांतीय अधिवेशन ......भाग-12
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माइक से घोषणा हुयी कि हमारे आज के मुख्य अथिति माननीय मुख्यमंत्री जी, बहुत जल्दी हमारे बीच पहुंचने वाले हैं। अतः सभी से अनुरोध है कि अपना स्थान ग्रहण कर लें। यह घोषणा शायद इसलिये की गयी थी, जिससे पांडाल में शिक्षकों की संख्या बढ़ जाय। क्योंकि हमारे शिक्षक नेता बोल रहे थे और कोई उनको सुन नहीं रहा था। सभी छोटे-छोटे समूहों में दूर किनारे, दूसरे मैदान में खड़े थे। पंडाल में मेरी तरह ही लोग थे, जो या तो मेरी तरह अकेले थे या फिर अपनी सीट पहले से ही रिजर्व करना चाहते थे। उस घोषणा से किसी को कोई खास फर्क नहीं पड़ा। सबको पता था कि अभी मुख्यमंत्री जी आने वाले नहीं हैं। क्योंकि यह घोषणा इससे पहले भी दो बार दोहरायी जा चुकी थी।....
मैंने महसूस किया है कि हमारे शिक्षक साथी किसी अधिकारी, विधायक, मंत्री आदि को तो बहुत ध्यान से सुनते हैं। पर अपने अध्यक्ष/मंत्री को सुनना पसंद नहीं करते। ब्लॉक व जिले में तो कई बार जब अध्यक्ष / मंत्री बोल रहे होते हैं तो उनके सामने गिनती के शिक्षक बैठे होते हैं। जब हम ही अपने पदाधिकारियों का सम्मान नहीं करेंगे, तो विभागीय अधिकारी उनको क्या समझेंगे ? यही हाल संगठन के ब्लॉक से जिलों की आम बैठकों का होता है। जब अध्यक्ष के बोलने की बारी आती है, तब तक आधिकांश खिसक चुके होते हैं। सभी अध्यक्ष को सुना तो देते हैं, पर अध्यक्ष किससे अपनी बात कहे ? प्रान्त व मण्डल की बैठकों में भी ऐसा ही होता होगा ? कह नहीं सकता क्योंकि कभी मुझे इन बैठकों को देखने का मौका नहीं मिला।
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शिक्षक क्यों अपने प्रतिनिधियों की बातों को सुनना पसंद नहीं करते ? यह ब्लॉक से लेकर प्रान्त तक के शिक्षक प्रतिनिधियों के लिये रिसर्च का विषय होना चाहिये। कहीं यह तो नहीं कि हमारे प्रतिनिधियों ने अपने सदस्यों का विश्वास कभी जीतने की कोशिश ही नहीं की ? या उनकी कथनी और करनी में हमेशा फर्क रहा है ? इसलिये सदस्यों का उन पर और उनकी बातों पर विश्वास नहीं रहा ?
जो भी हो इस स्थिति को बदलना चाहिये। हमको अपने पदाधिकारियों को सुनना व आदर देना चाहिये। अगर पदाधिकारी खराब हैं और हम उनको सुनना नहीं चाहते, तो ऐसे पदाधिकारियों को हम चुनते क्यों हैं ? कोई गलत आदमी हमारा प्रतिनिधि न बन जाय इस बात का हम सबको ध्यान रखना होगा।
ब्लॉक से लेकर प्रान्त तक के चुने हुये प्रतिनिधियों को ईमानदारी से शिक्षक हितों के लिये कार्य करना चाहिये। और आम शिक्षक का भरोसा संगठन पर और अपने पदाधिकारियों पर बना रहे, इसके प्रयास करने चाहिये।
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मैं मंच पर विराजमान अपने प्रतिनिधियों को देख रहा था। उनमें एक गर्व का भाव दिख रहा था। वह हमारी वजह से सामने मंच में बैठे थे। क्या मंच पर बैठ कर जब वह हमारी तरफ देख रहे होंगे, क्या वह भी सोच रहे होंगे कि वह हमारी बजह से इस सम्मान के हकदार हुये हैं ? नहीं तो वह भी मेरी तरह किसी किनारे की सीट पर बैठ कर यह नजारा देख रहे होते ।कोई अध्यापक जब उनको किसी कार्य के सिलसिले में फोन करता होगा, तो क्या वह सही रेस्पॉन्स देते होंगे ? क्या वह सोचते होंगे कि हम उनसे नहीं, बल्कि वह हमसे हैं।
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( जारी..)
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