"चाय पर चर्चा-प्रांतीय अधिवेशन ......भाग-13"
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मैं अभी और अपने शिक्षक प्रतिनिधियों के बारे में सोचता रहता। पर तभी एक शख्स मेरी तरफ आते दिखाई दिये। पहले तो मुझे लगा कि वह किसी और से मिलने आ रहे हैं। क्योंकि वह मुझे परिचित नहीं लग रहे थे। पर वह मेरे सामने आकर रुक गये।"भाई साहब, नमस्कार ! मैं महावीर।" उन्होंने अपना परिचय देते हुये, अपना हाथ आगे बढ़ा दिया।
"नमस्कार सर, क्षमा करें, मैंने आपको पहचाना नहीं ?" मैंने उनसे हाथ मिलाते हुये पूछा।
"मैं पिथौरागढ से हूँ।" उन्होंने अपने परिचय को आगे बढ़ाया।
"मैं आपकी चाय पर चर्चा पढ़ता रहता हूँ। आप काफी अच्छा लिखते हो।"
"धन्यवाद।" कोई मेरे लिखे को पसंद करता है। थोड़ी देर सेलिब्रिटी जैसी फीलिंग हुयी।
"पर आपने मुझे पहचाना कैसे ? क्या हम पहले कहीं मिले हैं ?"
"फ़ेसबुक में आपका फ़ोटो देखा था। इसलिये पहचान लिया। वैसे मैं सुबह से आपको ढूंढ रहा था। मुझे पता था कि आप यहाँ जरूर मिलेंगे।" महावीर जी ने कहा।
"आप मुझे ढूंढ रहे थे ? क्यों ?"
"आप को मेरे साथ भी एक चाय पीनी पड़ेगी।"
"क्यों?"
"हमारी भी कुछ समस्या है। आपको उसकी चर्चा करनी है।"
"क्यों मजाक करते हो, सर ! मेरे लिखने से क्या होगा ?"
"कुछ न हो, पर आपको चर्चा करनी पड़ेगी। चलिये सर, प्लीज। चाय पीके आते हैं।"
"मुख्यमंत्री आने वाले हैं, उनको सुनकर चलें ? "मैंने उनके सामने अपनी इच्छा रखी।
"भाई साहब, तब तक तो हम आते हैं।" उन्होंने मेरे प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
....
हम दोनों बाहर सड़क में आ गये। आस-पास कोई चाय की दुकान नहीं दिख रही थी, जहाँ बैठकर हम चाय पी सकें व बातचीत कर सकें। काफी दूर चलने के बाद हमको एक दुकान दिखाई दी। वहाँ बैठने के लिये भी पर्याप्त जगह थी और हम आराम से बातचीत कर सकते थे।
"भाई साहब, दो चाय।" महावीर जी ने आर्डर दिया ।
और फिर बैठते ही उन्होंने पूछा-
"सर, मेरी अभी नयी-नयी शादी हुई है।"
"बधाई हो।" मैंने कहा।
पर मैं थोड़ा कंफ्यूज हो गया कि महावीर जी, मुझ से क्या चाहते हैं।
"धन्यवाद सर, पर यह बधाई ज्यादा दिन तक नहीं रहने वाली है।"
"क्यों।" मैंने कहा।
"अगर एक दो महीने यही हाल रहा, तो हमारा तलाक होने वाला है।"
..
( जारी..)
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