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जून, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

उत्तराखंड की त्रासदी - 01

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प्रिय ,       देशवाशियों उत्तराखंड की त्रासदी आप सभी टी0वी0 में देख ही रहे होंगे। और इस त्रासदी की रिपोर्टिंग भी देख , सुन व पढ़ भी रहे होंगे। टी0वी0 पत्रकार व एंकर गला फाड़-फाड़ कर चिल्ला रहे हैं की देखिये हमारा चैनल सबसे पहले केदार नाथ पहुंचा है और आपको एक्सक्लूसिव तस्वीरें दिखा रहा है। लगभग सभी सबसे पहले पहुँचने का दावा कर रहे हैं।       ऐसी रिपोर्टिंग देख कर मेरे मन में कुछ सवाल उठ रहे हैं। ठीक है आप का चैनल सबसे पहले पहुंचा है। तो आपने ऐसा क्या तीर मार लिया ? हेलीकाप्टर से कौन नहीं पहुँच सकता ? और पहुँच कर आपने कितनों की जान बचाई ? जिन लाशों की तसवीरों को एक्सक्लूसिव बता कर टी0वी0 पर दिखा रहें हैं , उनमें से 05 से 10 लाशों की जिम्मेदार वह भी हैं। क्योंकि जिस विमान के द्वारा उनके क्रू को वहाँ ले जया गया होगा , अगर उस विमान में उनकी जगह रेसक्यू टीम के सदस्य जा पाते तो कम से कम वह कुछ लोगों को जिंदा जरूर बचा लेते।       प्यारे देश वाशियों ! उत्तराखंड के लोगों की गलत तस्वीर पेश की जा रही है। कहा...

स्थानांतरण नियमावली उत्तराखंड की समीक्षा-भाग 1

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   सम्मानित शिक्षक साथियों ! उत्तराखंड सरकार द्वारा राज्य स्थापना के 13 साल बाद शिक्षकों के लिए अपनी बहुप्रतीक्षित स्थानांतरण नियमावली घोषित कए दी है। हिमालयी राज्यों की सबसे बड़ी बिडंबना यह है कि दूरस्थ क्षेत्रों में , जहाँ सुविधाओं का आभाव होता है , कोई भी कर्मचारी रहना पसंद नहीं करता है। और पसंद करे भी कैसे ? 20 से 30 सालों से लोग लगातार परेशानियों से जूझते हुये नौकरी कर रहे हैं। जो सुगम में सुविधाजनक क्षेत्रों में कार्यरत हैं वह वहाँ से हटने को तैयार नहीं होते और मलाई काट रहे हैं। सबसे बड़ी बात सुगम में सुविधाजनक क्षेत्रों में कार्यरत कर्मचारी को वेतन भी ज्यादा मिलता है। ऐसे में दूरस्थ क्षेत्रों में कार्यरत कर्मचारी को अवसाद घेर लेता है और उसकी कार्य क्षमता में कमी आना स्वाभाविक है। प्राकृतिक न्याय का तकाजा भी यही है कि सभी को सुविधाजनक व असुविधाजनक क्षेत्रों में समान रूप से व बारी-बारी से कार्य करने का मौका मिले। पर ऐसा है नहीं शिक्षक संघटनों कि भूमिका भी इन मामलों में संधिग्द ही होती है। जो नियमावली बनी भी है वह दुर्गम व सुविधाजनक क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षक...