"ड्रेस का फतवा"- भाग-2



भाग-2
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नेगी जी ने बोलना जारी रखा। देखो ! सरकार ने अब तक जो भी निर्णय लिये हैं वह बिना शिक्षकों को पूछे लिये हैं। अब थोड़ी देर के लिये हम मान भी लें कि ड्रेस कोड लागू करने के पीछे कोई सकारात्मक उद्देश्य छुपा है। फिर भी इस संबंध में शिक्षकों के साथ चर्चा-परिचर्चा कर , एक सहमति बना कर लागू करो। शिक्षकों को समझाओ कि ड्रेस कोड किस तरह शिक्षा के या शिक्षकों के हित में है। अगर चर्चा- परिचर्चा में शिक्षकों को लगेगा कि यह शिक्षा या हमारे हित में है तो भला कोई क्यों मना करेगा ? आखिर हम शिक्षक भी शिक्षा के भले के लिये ही तो हैं। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जैसे शिक्षा के भले की चिंता केवल सरकार को व अधिकारियों को है। शिक्षकों का तो शिक्षा व्यवस्था से कोई लेना देना ही नहीं है। सवाल केवल ड्रेस कोड का नहीं , सभी आदेशों का है। शिक्षा से जुड़ा लगभग हर आदेश फतवे की शक्ल में जारी किया जाता है। शिक्षक के पास आपने देश के भविष्य को सौंपा है। उसको निर्णय की प्रक्रिया में शामिल कीजिये। यह केवल यहीं की नहीं, पूरे देश की स्थिति है। शिक्षा के लिये कोई भी नीति बनाते समय शिक्षकों का प्रतिनिधित्व नामात्र का होता है। अगर होता भी है तो उनकी भूमिका केवल हस्ताक्षर करने भर की होती है। 
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पूरे देश में शिक्षकों को कर्मचारी मान लिया गया है,वह भी दोयम दर्जे का। अभी कुछ दिनों पहले एक राज्य के कुछ जिम्मेदार अधिकारियों ने खुले में शौच करने वाले लोगों की फोटो खींचने में अध्यापकों की ड्यूटी लगा दी। इसको महज हंसी में नहीं लिया जा सकता। यह उस मानसिकता का परिचायक है जो पूरे देश में शिक्षकों के प्रति पनप रही है। क्या सरकार के पास शिक्षकों के अलावा कोई और कर्मचारी नहीं हैं ? ऐसे बेफालतू के आदेशों का शिक्षकों को जोरदार विरोध करना चाहिये। पर दुर्भाग्य से हम ऐसे आदेशों के विरोध के लिये भी सामूहिक रूप से खड़े नहीं हो पाते हैं। और चुपचाप उन आदेशों को स्वीकार करते रहते हैं। 
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देश में एक अजब सा खेल चल रहा है जिसमें सरकारें और अधिकारी अपने को ईमानदार व शिक्षकों को कामचोर व निकम्मा घोषित करने में लगी हैं। जिन सरकारों व अधिकारियों पर अपने प्रतिष्ठानो की गुणवत्ता व प्रचार का जिम्मा है, वही उनका दुष्प्रचार करने पर लगे हैं। सरकारी शिक्षकों को निकम्मा घोषित करवाने की एक साजिश चल रही है। जानते हो क्यों ? नेगी जी ने मुझसे सवाल किया। मैंने ना में सिर हिला दिया। मेरे ना में सिर हिलाने पर नेगी जी ने बोलना जारी रखा। क्योंकि शिक्षा एक भारी मुनाफ़े का व्यवसाय बन गया है। और इस पर माफियाओं की नजर है। इस व्यवसाय को सरकारी स्कूलों की बजह से फलने-फूलने में दिक्कत आ रही हैं। यह तभी संभव है जब सरकारी स्कूलों को हेय बना दिया जाय। इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में तो सरकारी स्कूल पहले से ही बुरे हालातों में थे। पर सरकारी शिक्षकों की मेहनत व योग्यता की बजह से लोग अपने बच्चों को इन विद्यालयों में भेजते थे। शिक्षा माफियाओं को लगा कि सरकारी शिक्षकों को बदनाम किये बगैर यह सम्भव नहीं है। फिर विभिन्न एन0जी0ओ0 से मिलकर शिक्षकों को बदनाम करने की साजिश रची जा रही है । एन0जी0ओ0 अगर यह नहीं कहेंगे कि सरकारी शिक्षा की हालत खराब है, तो उनको पैसा कौन देगा ? और किसलिये देगा ? बात यहाँ तक रहती तो चलता। पर जब खुद सरकार और अधिकारी भी अपने ही संस्थानों और कर्मचारियों को नकारा साबित करने लगेंगे, तो फिर लोग तो यकीन करेंगे ही। 
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आज शिक्षा व्यवस्था की नाकामयाबी का ठीकरा केवल शिक्षकों की खोपड़ी में फोड़ा जा रहा है। मैं चुपचाप सुनता रहा। नेगी जी ने फिर चाय की दो चुस्कियां ली। फिर मुझसे बोले शायद आप बोर हो रहे हो। मैंने नहीं में सिर हिलाया। और यह सच बात थी कि मुझे बोरियत नहीं आ रही थी, बल्कि सुनने में अच्छा लग रहा था। पहली बार मैं ऐसे डिस्कसन में शामिल था जो शिक्षा से जुड़ा था। वरना बेफालतू की बातों में ही दिन बीत जाता था। 
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( जारी............)

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