"ड्रेस का फतवा"-भाग-3



भाग-3
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थोड़ा चुप्पी के बाद नेगी जी ने फिर बोलना शुरू किया। आप अभी इस सिस्टम में नये आये हो। आपको भी दो-तीन साल हो गये हैं। आपने क्या अनुभव किया कि क्या सच में शिक्षक पढ़ाते नहीं हैं ? नेगी जी के इस सवाल ने मुझे अपने अनुभवों को टटोलने का मौका दे दिया।
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जब मैं नौकरी में नहीं था तब मेरी धारणा भी सरकारी स्कूलों के प्रति वही थी जिसका प्रचार आज कल किया जाता है, कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती। मैं खुद सरकारी स्कूल में पढ़ा हूँ। फिर भी मैं इस दुष्प्रचार का शिकार हो गया था। अब जब मैं खुद शिक्षक हूँ, तो अपने पुराने स्कूल के बारे में सोचता हूँ । जब मैंने दसवीं पास की तो उसी समय हमारे स्कूल को इंटर की मान्यता मिल गयी थी। पर वहाँ आज तक प्रवक्ता के पद सृजित नहीं हुए हैं। तब तो मुझे यह भी पता नहीं था कि सृजित पद क्या होते हैं ? और एक आम आदमी भी यह नहीं जानता कि पद सृजन क्या होता है ?
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अब जब मैं विभाग में आ गया हूँ, तो पीछे लौट कर सोचता हूँ , तो पता चलता है कि हमारे अध्यापक हमारे लिये कितनी मेहनत करते थे। हमारे विद्यालय में कुल 05 अध्यापक कार्यरत थे। उनमें से 02 तो जूनियर के थे और 03 एल0टी0 के। जब मैं विद्यार्थी था तो मुझे नहीं पता था कि शिक्षकों के भी कैडर होते हैं। उस समय तो हम परिचारकों , प्रवर सहायकों को भी गुरुजी प्रणाम बोला करते थे। हम सब को गुरुजी ही समझा करते थे। जो तीन टीचर एल0टी0 के थे। उनमें एक हिंदी, एक गणित व एक विज्ञान के टीचर थे। जब हमारा विद्यालय इंटर हुआ तो वहां प्रवक्ता पद तो सृजित नहीं हुये थे। पर 11वीं की कक्षायें शुरू कर दी गयी। गणित वाले गुरुजी हमको गणित व फिजिक्स पढ़ाते थे। विज्ञान वाले गुरुजी बायोलॉजी, केमिस्ट्री व इंग्लिश पढ़ाते थे। और हाइस्कूल में तो यह अपना सब्जेक्ट पढ़ाते ही थे। कला सेक्शन को जूनियर के व हिंदी वाले गुरुजी संभालते थे। जाहिर है इनके लिये प्रवक्ता के 30 व एलटी के 36 पीरियड के मानक का कोई मतलब नहीं था। सबको 40 से ज्यादा पीरियड पढ़ाने पड़ते थे। ऊपर से प्रिंसिपल का पद भी खाली था। प्रिंसिपल वाले कार्य को गणित वाले गुरुजी देखते थे।
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लगातार 04 पीरियड पढ़ाने पर मेरी खुद की हालत खराब हो जाती है। और ऊपर से बच्चों की शिकायतें व किल-किल से दिमाग खराब हो जाता है। कभी कभी तो छुट्टी होने तक सरदर्द हो जाता है। जब घर जाता हूँ तो सरदर्द की बजह से खाना भी नहीं बना पाता हूँ। सीधे सो जाता हूँ। आज जब मैं अपने अध्यापकों के बारे में सोचता हूँ। तो मन श्रद्धा से भर जाता है। कितना काम करते थे वह। आज भी वह उसी मेहनत से काम कर रहे हैं। क्योंकि मेरे विद्यालय में अभी तक भी प्रवक्ता पद स्वीकृत नहीं हुये हैं। मुझे अंदर से ग्लानि होती है कि मैं भी कितना बेवकूफ था कि सुनी-सुनायी बातों पर तो यकीन कर लिया पर कभी इससे पहले इस एंगिल से सोचा ही नहीं।
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अब इसी वर्तमान स्कूल में कार्यरत शिक्षकों को देखता हूँ। एक-दो को छोड़ दें तो सभी मेहनत से बच्चों के साथ लग के काम करते हैं। अपने गुसांईं जी को ही देख लो । 30 साल से ज्यादा इसी एक स्कूल में हो गये। इतना तो यहां के मूल निवासी भी गांव में नहीं रहते। इतने लम्बा ठहराव होने के बाद भी अपने कार्य में कोई कमी नहीं करते। मैं उनको देखकर कान पकड़ता हूँ, और अक्सर कहता हूँ कि धन्य हैं सर, आप । मैं तो एक जगह पर इतना ठहराव झेल नहीं सकता। मेरे लिये तो इतने वर्षों तक एक ही जगह पर ठहरना , एक प्रकार से सड़ना हुआ। फिर भी आप बच्चों को उसी लगन से पढ़ा लेते हो ? गुसाईं जी का जबाब होता, मेरा इतना ठहराव सरकार व विभाग की नकारेपन की बजह से है, इसमें बेचारे इन बच्चों का क्या दोष ? मैं चुप हो जाता। पर आज मैं सोच रहा हूँ तो नेगी जी की रौ में ही सोच रहा हूँ। वास्तव में ऐसे न जाने कितने गुसांईं जी हैं । जो इस भाव से सेवा कर रहे हैं। जब कोई गुसाईं जी के सामने कहता होगा कि सरकारी टीचर पढ़ाते नहीं हैं। उनके मन पर क्या गुजरती होगी ? तब उनकी क्या प्रतिक्रिया रहती होगी ? उनसे पूछुंगा जरूर।
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(जारी......)

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