"वर्दी वाले गुरुजी"
तो आखिर आज ड्रेस सिलकर आ ही गयी। रावत जी बड़े खुश लग रहे थे। ड्रेस को टेलर की दुकान से घर लाने में बमुश्किल 15 मिनट लगे होंगे। और दिनों की बात होती तो आधा घंटा तो इतनी दूरी तय करने में लगता ही। बड़े अरमान थे कि शिक्षकों की भी ड्रेस होनी चाहिये। अरमान पूरे हुये, तो ख़ुशी में दूरी को तय करने में आधा समय लगना ही था। रावत जी को कोट पैंट और टाइ पहने का खास शौक था। जब भी कहीं पार्टी का निमंत्रण मिलता तो वह अपना कोट-पैंट टाइ का शौक पूरा कर लेते। स्कूल में 15 अगस्त व 26 जनवरी को वह हमेशा कोट-पैंट व टाइ में नजर आते। वह साथियों से कहते हम पोस्ट ग्रेज़वेट हैं ,आखिर लगना भी तो चाहिये।
रावत जी जैसे ही घर पहुंचे सबसे पहले अपनी पूरी ड्रेस को पहन कर चेक किया। स्टील ग्रे पैंट और डार्क स्काई ब्लू शर्ट पहनी । पत्नी को आवाज लगाई अरे ! रोहन की मम्मी जरा इधर तो आओ । कैसा लग रहा हूँ ? पेट्रोल पम्प वाले लग रहे हो, पत्नी ने हंसते हुये कहा । रावत जी का मुहँ उतरा देख, पत्नी बोली मैं मजाक कर रही हूँ। रावत जी ने गहरी सांस ली। रोहन के पापा ! सब कुछ तो ठीक है, पर सरकार ने क्या सोचकर ग्रे व डार्क ब्लू रंग चूज किया ? इन रंगों को चुनने के पीछे क्या कारण रहा होगा ? रावत जी की समझ में नहीं आया कि क्या जबाब दूँ। अब सरकार ने तय किया है तो कुछ सोच के ही तय किया होगा, रावत जी ने जबाब दिया। तब तक रोहन भी वहाँ आ धमका। वाह ! पापा झक्कास लग रहे हो, झक्कास । यही बात अगर स्कूल के किसी बच्चे ने कह दी होती तो उसके रैप्टा पड़ना तय था। पर खुद के बच्चे ने कहा है तो चलेगा।
रावत जी ड्रेस के लिये निर्धारित की गयी तिथि से पहले ही ड्रेस पहनकर स्कूल जाना शुरू करना चाहते थे। वह उन शिक्षकों में हैं , जो चाहते हैं कि ड्रेस कोड होना चाहिये। इसलिये वह इस संडे को एक दिन की छुट्टी लेकर अपने घर कोटद्वार गये थे। पिछले संडे भी एक छुट्टी लेकर वह ड्रेस सिलवाने दे आये थे। इस बार वह ड्रेस लेने आये थे।
सिली हुई ड्रेस को देख-देख कर उनका मन पुलकित हुआ जाता था। उनको बचपन याद हो आया। ऐसे खुश वह अक्सर तब होते थे, जब बैसाख के महीने थौल-कौथीग ( मेले ) होते थे। सब भाई- बहनों के लिये साल में इसी समय नये कपड़े बनते थे।
और सबके लिये एक ही थान से एक ही रंग के कपड़े बनते थे। कपड़ो से ही सभी भाई-बहनों की पहचान हो जाया करती थी।
आज सुबह रावत जी तड़के ही उठ गये थे। उनका स्कूल आस-पास के गांवों से दूर जंगल के बीच स्थित था। स्कूल के सबसे नजदीक के गाँव से भी स्कूल जाने में पौन घंटे से ऊपर का समय लग जाता था। पहली बार आने वाला तो ढेड़ घंटे से भी ज्यादा का समय ले लेता है। रावत जी ने इसी गांव में किराये पर कमरा ले रखा था। स्कूल जाने के लिये खड़ी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। रावत जी ने प्रेस के लिये कपड़े निकाले। पर कमबख्त लाइट को भी ठीक इसी समय जाना था। बिजली वालों के लिये उन्होंने गढ़वाली में एक गाली दी। और अपने पिछले साल खरीदे ब्लैक लैदर सूज निकालकर उन पर पॉलिस करने लगे। लाइट को आना न था, इसलिये आयी भी नहीं।
रावत जी ने बिना प्रेस के ही ड्रेस पहनने का निर्णय लिया। और स्कूल के लिये चल पड़े। गाँव से गुजरते समय लोगों ने सामान्य दिनों की तरह गुरुजी नमस्कार किया। और किसी ने भी उनकी ड्रेस पर ध्यान नहीं दिया। पर रावत जी परेशान होने लगे कि गाँव वालों ने आखिर उनकी ड्रेस को नोटिस क्यों नहीं किया ?
आज लाइट का इंतजार करने से रावत जी थोड़ा लेट हो गये थे। इसलिये चाल को थोड़ा तेज करना पड़ा। जैसे-तैसे रावत जी स्कूल पहुँचे। वह पसीने से तर-वतर हो चुके थे। उन्होंने टाइ की नॉट को ढीला किया, देखा तो पूरी कमीज पसीने से भीग कर शरीर पर चिपक गयी थी। कुर्सी में बैठे ही थे कि पूरी पैंट भी पीछे से धूल से भर गयी। खड़े होकर पैंट को हाथों से झाड़कर साफ करना चाहा, पर पूरी तरह से साफ नहीं हो पायी। बच्चे से एक बेकार पेज मांगा, और कुर्सी को साफ कर उसपे फिर बैठ गये। और जेब से रुमाल निकाल उसको पंखा बनाकर खुद पर झलने लगे।
अभी शरीर का पसीना पूरी तरह सूखा भी नहीं था कि एक बच्चा आया, गुरुजी-गुरुजी अंदर कमरे में कुत्ते ने टट्टी कर रखी है। स्कूल में दरवाजे तो थे, पर कुत्ते,बिल्ली आसानी से कमरे से अंदर बाहर आ जा सकते थे। और दिनों की बात होती तो रावत जी बच्चों से कह देते कि आप लोग सफाई कर दो। पर अभी कुछ दिनों पहले जब बच्चे अपना कक्षा कक्ष साफ कर रहे थे, तो ग्राम प्रधान ने देख लिया था। और रावत जी की रिपोर्ट कर दी थी। खूब अखबार बाजी हुयी। रावत जी के सस्पेंड होने की नौबत आ गयी थी। रावत जी ने अधिकारियों के सामने गिड़गिड़ाए कि सर ! स्कूल में कोई स्वीपर या चपरासी का पद तो है नहीं, फिर सफाई बच्चे नहीं करेंगे तो कौन करेगा ? अधिकारियों ने कहा कि बच्चों से आप सफाई नहीं करवायेंगे । तो सर ! स्कूल की सफाई कौन करेगा ? यह हम नहीं जानते। सर! NCF 2005 में भी कार्यानुभव को पाठ्यचर्या का हिस्सा बनाने की बात कही गयी है ? कक्षा की सफाई करना भी तो कार्यानुभव ही है, सर। देखिये NCF हमें मत समझाओ। हम बस इतना जानते हैं कि बच्चे सफाई नहीं करेंगे। आखिरकार रावत जी ने जैसे-तैसे अधिकारियों के पैर पकड़ अपनी नौकरी बचाई।
अब आज रावत जी ड्रेस में थे अपनी कुर्सी की सफाई तो कर दी थी। पर ड्रेस में कुत्ते की टट्टी साफ करने को उनका मन गँवारा नहीं कर रहा था। आखिर कुत्ते की टट्टी किस से साफ करवायी जाय ? यही सोचते-सोचते उनको भोजन माता का खयाल आया। उन्होंने किसी बच्चे को भोजन माता को बुलाने भेजा। भोजन माता आयी, और जब रावत जी ने कुत्ते की टट्टी साफ करने को कहा। तो वह हत्थे से उखड़ गयी। देखो गुरुजी ! मेरा काम बच्चों के लिये खाना बनाना है, कुत्ते की टट्टी साफ करना नहीं। सरकार आपको हजारों रुपये तनखा देती है, आप ही साफ कर दो। रावत जी कहना चाहते थे, तनख्वाह मुझे बच्चों को पढ़ाने के लिये मिलती है, सफाई करने की नहीं। पर चुप रह गये। इस बात को जब हमारे अधिकारी ही नहीं समझ पा रहे तो, बेचारी भोजन माता से क्या उम्मीद करनी ?
अब कोई चारा नहीं था। ड्रेस को पहनने का सारा उलार जाता रहा। रावत जी उठे स्कूल के बगल से कुछ झाड़ियाँ तोड़ी, एक पुराना अख़बार उठाया और कुत्ते की टट्टी साफ करने चल दिये। रावत जी कमरे के अंदर पहुँचे,पूरा कमरा गंदा पड़ा था, मुंह पर रुमाल बांधा, जैसे ही टट्टी साफ करने को झुके तो उनकी टाइ टट्टी को छूते-छुटे बची । टाइ को बेल्ट के अंदर ठूंस, फिर झुके तो नजर अपने जूतों पर पड़ी। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि सुबह पॉलिस की होगी। मिट्टी से इस कदर ढक गये थे कि काला रंग कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। उन्होंने हाथ में उठायी झाड़ियों से पहले अपने जूतों को साफ करने की असफल कोशिश की। फिर कुत्ते की टट्टी साफ करने लगे। बाहर दरवाजे व खिड़की पर बच्चों का जमघट उत्साह से 'ऑपरेशन कुत्ते की टट्टी' को झांक-झांक कर देख रहा था। कुत्ते की टट्टी व पूरे कमरे की सफाई कर रावत जी वापस अपनी कुर्सी में बैठ मिड-डे-मील का रजिस्टर व अन्य डाक निबटाने में लग गये।
छुट्टी के बाद जब रावत जी ने घर पहुंच कर अपनी ड्रेस उतारी तो उनकी नजर अपनी कमीज पर गयी । पसीना तो सूख गया था, पर कमीज पर पसीने के दाग सफेद-सफेद लाइनों के रूप में दिख रहे थे। अब उन्होंने पैंट व जूतों की तरफ देखा तो एक ही दिन में ड्रेस पहनने का सारा उत्साह जाता रहा। वह सोचने लगे कि ड्रेस वहीं के लिये ठीक हैं जहाँ साफ-सफाई की उचित व्यवस्था हो, गाड़ी से उतर कर सीधे ऑफिस में प्रवेश करना हो, ऑफीस में ए0सी0 नहीं तो कम से कम पंखे की व्यवस्था तो हो ही। जूतों को उन्होंने चारपाई के नीचे सरकाया व ड्रेस को कमरे की खूंटियों में टांक दिया।
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