"ड्रेस का फतवा"- भाग-4




भाग-4
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"आप ने मेरी बात का जबाब नहीं दिया ?" नेगी जी के सवाल ने मेरी तंद्रा तोड़ी और मैं वापस उनके साथ लौट आया।
"नहीं सर, मैं ऐसा नहीं मानता कि शिक्षक पढ़ाते नहीं हैं। ऐसी समाज में एक धारणा बना दी गयी है,मुझे तो यही महसूस होता है,सर । मैं खुद पहले पब्लिक स्कूल में पढ़ाता था। पब्लिक स्कूलों की भी अलग-अलग श्रेणियां हैं। हालांकि यह कोई ऑफिसियल श्रेणियां नहीं हैं। पर ऐसा बेरोजगारी के दौरान आवेदन के समय हम दोस्त मानते थे। कुछ ऐसे स्कूल हैं जिनकी फीस लाखों में है। कुछ ऐसे हैं जिनकी हजारों में है। और कुछ ऐसे हैं जिनकी फीस सैकड़ों में है। सामान्यत: अधिकांश स्कूल ऐसे हैं जिनकी फीस एक हजार से पाँच हजार प्रतिमाह है। और सबसे ज्यादा एडमिशन हेतु भीड़ इन्हीं स्कूलों में है। अधिकांश अभिभावक इसी दायरे में आते हैं जो इस फीस को अफोर्ड कर सकते हैं। भीड़ है, तो छंटनी भी है। और सभी अच्छे को ही लेना चाहते हैं । और ले भी लेते हैं। जो बचते हैं उनके लिये भी दो सौ से पांच सौ तक की फीस में स्कूल उपलब्ध हैं। और इतना तो ध्याड़ी-मजदूरी करने वाले भी अफोर्ड कर लेते हैं। आजकल तो पब्लिक स्कूल में बच्चों को पढ़ाना फैशन हो गया है। पब्लिक स्कूल का मतलब इंग्लिश स्कूल। और ऐसा कौन सा भारतीय है जो इंग्लिश नहीं बोलना चाहता ?
हम कुछ भी बोलें कि हम आजाद हैं, पर अंग्रेजों ने हम भारतीयों का आत्मविश्वास इस कदर गिरा दिया है कि हम खुद को आज भी तुच्छ मानते हैं। अंग्रेजी बोलना श्रेष्ठता व बुद्धिमान होने की निशानी है। शायद यह बात हमारे जीन में आ गयी है। यही कारण है कि तमाम प्रयासों के बाद मां-बाप जब खुद अंग्रेजी नहीं बोल पाते, तो चाहते हैं उनके बच्चे बोलें। और यह तो पब्लिक स्कूल में ही हो सकता है। फिर जो लोग सौ-दो सौ फीस भी वहन नहीं कर सकते सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को भेजते हैं। मैं तो कहता हूँ कि सरकारी स्कूलों को भी अंग्रेजी माध्यम का कर देना चाहिए।"
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"नहीं, मैं आपके इस विचार से सहमत नहीं हूँ।" नेगी जी ने कहा। "आपने पब्लिक स्कूल की श्रेणियां बतायी, और अंग्रेजी के प्रति भारतीयों की मानसिकता बतायी इन बातों से मैं पूरी तरह सहमत हूँ। पर सरकारी स्कूलों को भी अंग्रेजी माध्यम का कर देना चाहिये। इस बात में मेरी सहमति नहीं है। बहुत सारे शिक्षक साथी भी आपके जैसा विचार रखते हैं कि सरकारी स्कूलों को भी अंग्रेजी माध्यम का कर देना चाहिये। मैं गलत भी हो सकता हूँ। पर मेरा मानना है कि सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या कम होने का कारण कमसे कम पढ़ाई का माध्यम नहीं है । हो सकता है कि यह भी एक कारण हो। पर क्या आप मानते हैं कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी करने से छात्र संख्या बढ़ जायेगी ? और लोग पब्लिक स्कूल से बच्चों को निकाल कर सरकारी स्कूल में डाल देंगे ? "मैं दावा नहीं कर सकता" मैंने कहा। यही मैं कहना चाहता हूँ। पढ़ाई का माध्यम एक मात्र कारण नहीं है। अगर ऐसा होता तो शिशु मंदिर, विद्या मंदिर में इतनी भीड़ नहीं होती। वहां भी एडमिशन के लिये मारा-मारी है। और फिर जब सारे शिक्षा शास्त्री सारे शिक्षा से सम्बंधित आयोग इस बात पर एक मत हैं कि पढ़ाई का माध्यम एक स्तर तक बच्चे की मातृभाषा होनी चाहिये। फिर अंग्रेजी थोपना कहाँ तक उचित है ? मुझे तो लगता है पब्लिक स्कूलों में भी पढ़ाई का माध्यम बच्चों की मातृभाषा कर देनी चाहिए।
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नेगी जी ने बोलना जारी रखा। सरकारी स्कूलों से लोगों के मोहभंग होने की बजह पढ़ाई का माध्यम नहीं है। बल्कि उपलब्ध कराये गये विकल्प के रूप में पब्लिक स्कूल हैं। पब्लिक स्कूल कहने को तो स्कूल हैं पर उनके इंफ्रास्ट्रक्चर व प्रबंधन को देखकर लगता है जैसे वह कोई बिजनेस मॉल हो। और हो क्यों, वह बिजनेस मॉल ही होते हैं। जब कोई बिजनेस होगा तो उसकी एडवरटाइजिंग भी होगी। और प्रबंधन अखबारों व टीवी में विज्ञापन देते हैं, और वह विज्ञापन क्या जो लोगों को आकर्षित न करे ? विज्ञापन में खेल का मैदान, अच्छे इंफ्रास्ट्रक्चर, अच्छे योग्य और क्वालिफाइड टीचर्स का जिक्र होता है। सरकारी स्कूलों का प्रबंधन सरकार व उसकी मशीनरी करती है। जो अखबारों में विज्ञापन तो नहीं देते पर अप्रत्यक्ष रूप से पब्लिक स्कूलों का विज्ञापन ही करते हैं। वह हर दूसरे दिन यह खबर छपवा देते हैं कि हमारा सब कुछ तो ठीक है, पर हमारे पास निकम्मे और अयोग्य टीचर्स हैं, जिनकी बजह से स्कूलों की हालत खराब हो गयी है। ऐसे में भला आप ही सोचो कि कोई क्यों सरकारी स्कूलों में अपना बच्चा भेजेगा ?
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(जारी......)

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