चाय पर चर्चा -भाग-2
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भाग-2
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इस दौरान मैं एक-दो बार फोन निकाल कर उन मित्र को कॉल कर चुका था। पर वह फोन नहीं उठा रहे थे। मुझे लगा कि वह बाइक चला रहे होंगे। इसलिए नहीं उठा रहे होंगे। मैंने इसीलिये बार-बार फोन करना उचित भी नहीं समझा। क्योंकि मेरे ऐसा करने से उनका ध्यान भंग हो सकता था। मेरी नजरों के सामने सड़क पर लिखे स्लोगन आ गये। जो ड्राइव करने वालों के लिखे होते हैं। "नजर हटी, दुर्घटना घटी।" इसलिये मैंने फोन करके उनकी नजर को हटाना उचित भी नहीं समझा। पर अपने अंदर के रसायनों के तूफान को कैसे संभालूं। यह मेरे लिये मुश्किल होता जा रहा था। क्योंकि मैंने बड़बड़ाना भी शुरू कर दिया था। कैसे लोग हैं यार, समय देते हैं। और समय से आते भी नहीं हैं। ऐसे लोगों के लिए समय की कोई कीमत ही नहीं। अरे, खुद ही कमसे कम फोन कर देते। मुझे मालूम है कि कोई जब मेरा इंतजार करता होगा। यही सब कहता होगा। मैंने वापस लौटने का फैसला कर लिया। पर फिर सोचा, जब एक घंटा मैंने इंतजार कर ही लिया तो कुछ और सही। पर अपनी बेचैनी को कैसे कम करूँ ? यह सवाल भी साथ खड़ा था। ...
अचानक मुझे एक हल सूझ गया। अरे, क्यों नहीं तब तक मैं किसी चाय की दुकान में चाय पी-लूं । थोड़ा खोजने के बाद मुझे एक चाय की दुकान दिख गयी। दुकान के बाहर प्लास्टिक की दो मेज अलग-अलग लगी थी। और दोनों मेजों के चारों तरफ चार-चार प्लास्टिक की कुर्सियां रखी थी। एक मेज में तीन लोग बैठे थे। मैं दूसरी खाली मेज के साथ लगी एक कुर्सी में बैठ गया। मैंने दुकानदार को एक चाय का आर्डर दिया। तो दुकानदार ने दस मिनट इंतजार करने को कहा। क्योंकि उसके पास दूध खत्म हो गया था। मुझे लगा कि आज इंतजार करना ही किस्मत में लिखा है। मैंने फिर अपने फोन को जेब से बाहर निकाला। और फिर व्हट्स ऐप व फ़ेसबुक को खोल कर देखने लगा। कोई नया नोटिफिकेशन नहीं दिखा। क्योंकि इंतजारी की बेचैनी के कारण मैं कम से कम चालीस से पचास बार फोन को यूं ही चेक कर चुका था। पर इस दौरान मैंने कोई भी पोस्ट या किसी भी नोटिफिकेशन को ध्यान से नहीं पढ़ा। केवल खोला भर। मैंने अपना फोन वापस जेब में रख दिया। क्योंकि पड़ोस की मेज में चल रही चर्चा ने मेरे कान खड़े कर दिये थे।
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"देखो सरकार ने सही फैसला किया कि दो हजार से अधिक सरकारी स्कूलों को बंद कर दिया" उनमें से एक आदमी ने अखबार में नजर गड़ाये-गड़ाये कहा।
जब भी सरकारी स्कूलों की बात हो रही होती है तो मैं अतिरिक्त सतर्क हो जाता हूँ। मुझे लगता है मैं पिछले जन्म में जरूर सरकारी शिक्षक रहा होऊँगा।
"क्या ? सच कह रहे हो ?" दूसरे सज्जन ने अपने फोन से नजर हटाते हुये कहा।
"लो खुद ही देख लो" पहले वाले सज्जन बोले। उसने अखबार दूसरे के सामने कर दिया।
"ये सरकार ने बहुत अच्छा किया। मैं तो चाहता हूँ कि दो हजार क्यों, सारे सरकारी स्कूल बंद हो जाने चाहिये।" दूसरे ने अखबार में छपी खबर को देख, खुश होते हुये कहा।
"क्यों ?" पहले वाले ने पूछा।
"अरे, सरकारी स्कूलों में कुछ पढ़ाई-लिखाई तो होती नहीं, मास्टर पढ़ाते ही नहीं हैं।" दूसरे ने समझाया।
"हाँ, ये तो आप सही कह रहे हो। मास्टरों ने सचमुच सरकारी स्कूलों को बरबाद कर दिया है।" अब पहले वाले सज्जन भी दूसरे से सहमत होते हुये बोले। दोनों फिर चुप हो गये। पहले वाले सज्जन पुनः अखबार में डूब गये और दूसरे अपने फोन में। थोड़ी देर मेज के आस-पास पुनः सन्नाटा छा गया। मैं फिर इंतजारी की बेचैनी में घिरने लगा।
"आप दोनों ऐसा कैसे कह सकते हो ? आप का यह सब कहने का आधार क्या है ?" तीसरे व्यक्ति ने पहली बार अपनी चुप्पी तोड़ी और मेरा ध्यान फिर उस मेज की तरफ खींच लिया।
photo sabhar google
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