"दुर्गमिस्तान"



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भाग- 01
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आपको नाम सुना सुना और सूना सूना भी लग रहा होगा ? पर अभी आपको ठीक-ठीक समझ नहीं आया होगा कि यह कहाँ सुना ? और यह जगह कहाँ है ? आपको ठीक-ठीक वह वाली फीलिंग आ रही होगी 'कि मेरे पेट में तो बात आ रही है, पर दिमाग में नहीं।' चलो हम ही बता देते हैं। यह एक प्रकार की जेलों का सामूहिक नाम है। और क्लीयर करूँ तो "दुर्गम" एक जेल का नाम है, और "दुर्गमिस्तान" बहुत सारे दुर्गम जेलों के समूह का नाम है। यह खास प्रकार की आधुनिक जेलें हैं। जहाँ एक से लेकर बीस-बीस, पच्चीस-पच्चीस कैदी बंद रहते हैं। और इन जेलों में कैदियों को तब तक बंद रखा जाता है जब तक वह साठ साल के न हो जांय।
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इन जेलों की खासियत यह है कि इनकी कोई ऊंची दीवारें नहीं हैं, पर एक सीमा रेखा है। जिसको हर कोई नहीं लांघ सकता। साठ साल से पहले हर कोई इस सीमा को लांघने का प्रयास करता है। पर विरले ही साठ साल से पहले इस सीमा रेखा को पार कर पाते हैं। इस सीमा को लांघने का हर कोई प्रयास करता है पर या तो उसके पैर छोटे पड़ जाते हैं या फिर पापी पेट सामने आ जाता है। इस सीमा को वही लांघ सकता है जिसके पैर बहुत लंबे हों या जिसका पापी पेट न हो। 
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भट्ट जी भी इन्ही जेलों में कैद एक कैदी हैं। जो अपने ही जैसे कुछ और कैदियों के साथ रह रहे हैं। बीच-बीच में पैरोल पर छूटते हैं ( छुट्टियों में ) अपने घर परिवार से मिल आते हैं। भला हो लोकतांत्रिक व्यवस्था का। जिससे सरकार इतनी दरियादिल तो है कि कमसे कम पैरोल पर कुछ समय के लिये छोड़ देती है। सालभर में चौदह दिन कैदियों की मर्जी से और पैंतालीस दिन जबरदस्ती अपनी मर्जी से। भट्ट जी को इस एक ही जेल में 20 साल हो गये हैं। भट्ट जी को कभी-कभी अवसाद घेर लेता है। और वह अपने में बड़बड़ाते लगते हैं आखिर मैंने ऐसा कौन सा गुनाह किया है ? मुझे यहां से रिहा क्यों नहीं किया जा रहा है ? पुराने फैशन की जेल होती तो आवाज दीवारों से टकरा कर वापस आ जाती। कम से कम यह सकून तो रहता कि दीवार ही सही, कोई सुन तो रहा है। पर कमबख्त इस आधुनिक, बिना दीवारों की जेल में आवाज कहीं दूर खो जाती है।
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फिर भट्ट जी अवसाद से बचने के लिये आस्था टी0वी0 खोल लेते हैं। और रामदेव बाबा के साथ कपाल-भाती कर सांसो के साथ अपने अवसाद को भगाने का असफल प्रयास करते हैं। भला हो लोकतांत्रिक मूल्यों का कि हमारी सरकार ने सेटेलाईट टीवी0 के लाइसेंस दे दिये। वरना दस-पंद्रह साल पहले भट्ट जी छत में रखे दूरदर्शन के एंटीना को घुमाते रहते, पर सिग्नल आने का नाम न लेते थे। टीवी लाने का उनका सारा उत्साह जाता रहा। तब सड़क से यह जेल दो घंटे की खड़ी चढ़ाई पर थी। बड़े अरमान से घोड़े की पीठ पर इस टीवी0 को लाये थे। किसी ने उस दौरान सिग्नल बूस्टर लाने की सलाह दी थी। पर उससे भी काम नहीं बना था।
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( जारी...)

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