चाय पर चर्चा
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भाग-3
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"इसमें आधार की क्या बात है?" दूसरे वाले ने कहा।
"देखिये, यूँ ही किसी बात को कहना उचित नहीं है।" तीसरे सज्जन ने समझाना चाहा।
"आये दिन तो अखबारों में सरकारी स्कूलों के बारे में छपता रहता है। इससे बड़ा आधार और क्या हो सकता है?" दूसरे सज्जन
बोले।

"अखबार में जो छपता है, क्या वही सच का पैमाना होता है ?" तीसरे सज्जन ने फिर दूसरे से सवाल किया।
दूसरे वाले सज्जन इस सवाल का जबाब क्या दें,इसके लिये अपने दिमाग पर जोर देने लगे। पर उनकी तरफ से कोई जबाब नहीं आता देख, तीसरे सज्जन ने आगे बोलना शुरू किया।
"अखबार को आधार माने तो ऐसा शायद ही कोई दिन होगा, जिस दिन अखबार में हत्या या बलात्कार की खबर न छपती हो। तो क्या हम अपने देश को हत्यारों व बलात्कारियों का देश मान लें ?"
पहले और दूसरे वाले सज्जन अब श्रोता की भूमिका में आ गये। वह कुछ बोलना तो चाह रहे थे, पर उनको न शब्द मिल रहे थे और न ही अपनी बात के समर्थन में कोई तर्क।
"यह अच्छी बात है कि हम किसी समस्या पर चर्चा करें। पर चर्चा एक पक्षीय नहीं होनी चाहिये।" तीसरे सज्जन ने कहा।
"चलो फिर आप ही हमको समझाओ कि अगर मास्टर पढ़ाते हैं तो फिर सरकारी स्कूलों में बच्चे कम क्यों हो रहे हैं ?" दूसरे वाले सज्जन ने कहा।
"आप जो खबर पढ़ रहे हैं, उनमें बंद होने वाले स्कूल पहाड़ी व दुर्गम क्षेत्रों के हैं। और इन विद्यालयों में बच्चों की संख्या में कमी का संबंध कम से कम टीचर्स के पढ़ाने व न पढ़ाने से बिल्कुल नहीं है। इसका कारण पलायन है। जब गांव में लोग रहेंगे ही नहीं फिर स्कूलों में बच्चे कहाँ से आयेंगे? पलायन रोकना सरकार का काम है, शिक्षक का नहीं। इसलिये हर बात के लिये शिक्षकों को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। आप तो सारे सरकारी स्कूलों को बंद कर देने की बात कर रहे हो। मैं तो जिनको बंद किया जा रहा है उनको बंद करने के पक्ष में भी नहीं हूँ।" तीसरे सज्जन ने जबाब दिया।
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मुझे उन लोगों की बातों में आनंद आने लगा था।
मैं चाह रहा था कि चाय बनने में कुछ और देर हो जाय। क्योंकि अक्सर ऐसा होता है, जब इस प्रकार की चर्चाओं में कोई अवरोध आ जाय तो चर्चाएं प्रायः समाप्त हो जाया करती हैं। जिसका डर था वही हुआ।कभी-कभी हम जो सोचते हैं वहीं क्यों होता है ? जैसे आपके घर में किसी बल्ब को लगे लंबा समय हो गया हो। अचानक किसी दिन आपके दिमाग में बात आती है कि अरे, यह बल्ब काफी चल गया, फ्यूज नहीं हुआ। अचानक तभी वह फ्यूज हो जाता है। ऐसे ही मैं सोच रहा था कि चाय न आये,पर आ गयी। और मेज की चारों तरफ चुप्पी छा गयी। मुझे दुःख हुआ कि यह चर्चा बंद हो गयी । चर्चा का यूँ समाप्त हो जाना मुझे अच्छा नहीं लगा। मुझे फिर अपने उन मित्र की याद आ गयी, जिनका मैं इंतजार कर रहा था। मैंने एक बार उन्हें फोन कर लेने का निश्चय किया। और जेब से अपना फोन निकाला। इससे पहले कि मैं अपने मित्र को फोन करता, चर्चा आगे बढ़ गयी। मैंने चुपचाप फोन को फिर अपनी जेब के हवाले किया। और अपना पूरा फोकस फिर उस मेज की तरफ कर दिया।
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"आप कह रहे कि यह स्कूल बंद नहीं होने चाहिए। इन स्कूलों में मुश्किल से चार या पांच बच्चे पढ़ रहे हैं। आपको नहीं लगता कि इन विद्यालयों को चलाते रहने पर सरकार को काफी नुकसान होगा" यह सवाल पहले वाले सज्जन ने किया। जिन्होंने इस चर्चा की चिंगारी को सुलगाया था।
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