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दिसंबर, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्रांतीय अधिवेशन ......भाग-08

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... प्लेटफार्म के गेट पर भीड़ अब थोड़ा कम होने लगी थी। मुझे लगा अब मुझे भी बाहर निकल जाना चाहिये। मैं भी बाहर निकलने वाली लाइन के पीछे खड़ा हो गया। जैसे ही मैं गेट पर पहुंचा, वहाँ पर एक काले कोट वाले ने मुझे रोक दिया। "टिकिट ?" "कैसा टिकिट ?" मैंने पूछा। "ज्यादा स्याणा मत बन, टिकिट निकाल।" "मैं सच कह रहा हूँ,सर ?" "किनारे खड़ा हो जा।" मैं किनारे पर खड़ा हो गया। वह रैंडम्ली लोगों से टिकिट माँग रहा था। लोग अपना टिकिट उसे दिखाते।फिर वह उनको छोड़ देता। इतनी देर में मैं समझ गया यह टीटी होगा। पर मैंने तो सुना था कि टीटी ट्रेन में टिकिट चेक करता था। पहली बार पता चला कि गेट पर भी चेकिंग होती है। वह टिकिट चेक करता रहा,मैं लोगों को देखता रहा। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं तो ट्रेन से आया नहीं, तो इन भाई साहब ने मुझे किनारे क्यों खड़े होने को कहा। "भाई साहब, मुझे देर हो रही है मैं जाऊँ ?"- मैंने थोड़ी देर किनारे खड़े रहने के बाद कहा। "चुप चाप खड़े रहो।"- टीटी ने मुझे डांटते हुये कहा। इतनी जोर से तो मैं अपने स्टूडेंट को भी नहीं ड...

प्रांतीय अधिवेशन ......- भाग-06

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... मेरी नजर स्टेशन पर लगी बड़ी-बड़ी डिजिटल घड़ियों पर गयी। वह लाल रंग में 05:16 मिनट का समय बता रही थी। मैंने अपने मोबाइल को निकाला उसमें समय देखा तो मेरा मोबाइल एक मिनट पीछे था। मैंने सोचा जब रेलवे स्टेशन की घड़ियाँ समय सही बता रही हैं तो हमारे यहाँ ट्रेन हमेशा देर से ही क्यों आती हैं। तभी अनाउंसमेंट होने लगा "यात्रीगण कृपया ध्यान दें गाड़ी नंबर 19019 अपने निर्धारित समय से आधा घंटा देर प्लेटफॉर्म न0 4 में आने की संभावना है।" वह अनाउंसमेंट एक अलग प्रकार की आवाज में था। इस प्रकार की आवाज भी मैं पहली बार सुन रहा था। नएपन की बजह से वह आवाज कुछ ज्यादा ही अच्छी लग रही थी। ...... थोड़ी दूरी पर मुझे चाय वाला दिखायी दे गया। मैं चाय वाले के सामने वाली बेंच में बैठ गया। मैंने एक चाय का आर्डर दिया और आस-पास देखने लगा। सामने दूर प्लेटफॉर्म के छोर पर, मुझे गाय माता आती दिखायी दी। एक पल के लिये तो मुझे लगा कि कोई गाय को ट्रेन से अपने साथ कहीं ले जा रहा है। फिर मुझे अपने बेवकूफी पर हंसी आयी, भला ऐसा भी कभी हो सकता है ? अपना हिंदुस्तान भी कितना प्यारा है, यहाँ मनुष्य और जानवर कितने मिलजुल कर...

प्रांतीय अधिवेशन......... भाग-05

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... बॉलकनी में भी मुझे काफी देर हो गयी थी। मैं वापस कमरे में लौट आया। थोड़ी देर फोन निकाल कर व्हट्स ऐप चेक किया तो विभिन्न ग्रुपों में चुनाव प्रचार के मैसेज भरे थे। थोड़ी देर फोन चेक करने के बाद मेरी आँखें भारी होने लगी। मुझे महसूस हुआ कि यदि मैं ज्यादा देर बिस्तर में ही रहा तो मुझे नींद आ जायेगी। मैं अभी सोना नहीं चाहता था क्योंकि फिर रात को नींद न आती। पर नींद को कैसे टाला जाय ? मैंने तय किया कि अधिवेशन स्थल को देखकर आया जाय। मैंने होटल के रिसेप्शन में कमरे की चाबी जमा की और रिसेप्शन वाले से लक्ष्मण विद्यालय का पता पूछा। उसने बताया कि रेलवे स्टेशन की पल्ली तरफ गुरु राम राय डिग्री कॉलेज पड़ेगा। उससे आगे चलते रहना उसी साइड में लक्ष्मण विद्यालय पड़ेगा। .... मैंने सड़क पार की और रेलवे स्टेशन की तरफ चल दिया। थोड़ी दूर चलने पर रेलवे स्टेशन का मुख्य द्वार दिख गया। मैं अपनी जिंदगी में पहली बार रेलवे स्टेशन के इतने पास आया था। मैंने ट्रेन को फिल्मों में देखा था। कभी कभार तब दिख जाती थी, जब मैं घर आते-जाते समय काशीपुर से गुजरता था। मेरा बहुत मन होता था कि मैं ट्रेन में बैठ कर कहीं सफर करूँ। ...

प्रांतीय अधिवेशन और पठन-पाठन- भाग-04

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... सुशील जी ने अब कोई नया सवाल नहीं किया। पर मैं यह भी नहीं कह सकता कि वह मेरे जबाब से संतुष्ट हुये या नहीं। हमारी चाय समाप्त हो गयी थी। उन दोनों ने मुझसे विदा ली और चले गये। मैंने कहा कल आओगे तो मिलना। मैं थोड़ी देर दुकान में बैठा रहा। क्योंकि मुझे तो कहीं जाना नहीं था। मैंने तय किया कि वापस होटल लौटा जाय।  .... मैं होटल के कमरे में लौट आया। अभी मैं धारचूला और देहरादून के वातावरण से सामंजस्य नहीं बिठा पा रहा था। एक अजीब प्रकार की बेचैनी सी हो रही थी। न बिस्तर में लेटा जा रहा था और न ही कुछ और करने का मन कर रहा था। मैं कमरे के बाहर बालकनी में आ गया और बाहर चलती गाड़ियों को देखने लगा। ऐसा लग रहा था कि जैसे शहर में कोई आपदा आ गयी हो और लोग जल्दी से जल्दी कहीं और भागना चाहते हों।धारचूला में जहाँ मैं रहता हूँ। वहाँ मैं महीनों में मुश्किल से कोई गाड़ी देख पाता हूँ, वह भी तब जब मुझे घर जाना होता है। जिस जगह से मैं घर के लिये मैक्स पकड़ता हूँ, वहाँ मुश्किल से एक दिन में तीन-चार मैक्स आती हैं। उन मैक्स का हमारी दिनचर्या से कोई ताल मेल नहीं होता। क्योंकि वह सुबह मार्केट की तरफ चलती हैं और...

प्रांतीय अधिवेशन और पठन-पाठन- भाग-03

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... "मैं धारचूला से आया हूँ, मैं भी आपकी तरह सम्मेलन में आया हूँ।" अब वह दोनों थोड़ा सहज हुये। और हाथ मिलाकर अपना परिचय दिया। "मैं अवनीश, उत्तरकाशी से" "मैं सुशील उत्तरकाशी से" अब हम तीनों एक साथ बैठ गये। चाय आ गयी और चाय के साथ बातचीत में लग गये। "आप धारचूला कब से हैं ?"- सुशील ने मुझे पूछा। "उन्नीस साल से, 1998 की नियुक्त है मेरी।" "आप दोनों को कितने साल हुये अभी उत्तरकाशी में ?"- मैंने पूछा। "मुझे ग्यारह साल हो गये, 2006 की नियुक्ति है मेरी। इनको अभी दो साल ही हुये हैं। इनको भी हो ही जायेंगे, ग्यारह साल एक दिन। आपको उन्नीस साल हो गये। इस बात को आपसे बेहतर कौन जान सकता है।"- सुशील ने जबाब दिया। "नहीं, मुझसे ज्यादा सालों वाले भी हैं, वह और बेहतर जानते होंगे।" हम तीनों इस बात पर एक साथ हंस दिये। "आपके यहाँ से कितने लोग आये हैं ?"- अवनीश ने मुझसे पूछा। "दो। पर वोट एक का है। मैंने भी वहांनिदेशक का आदेश रास्ते में देखा। मैं तो वापस लौट रहा था सोचा चलता ही हूँ।" "हमारे यहाँ से वोट द...

प्रांतीय अधिवेशन और पठन-पाठन- भाग-01

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काशीपुर के बाद मेरे व्हट्स ऐप में कोई नोटिफिकेशन नहीं दिख रहा था। मुझे लगा कि नेटवर्क प्रॉब्लम होगी। अफजलगढ़ पहुंचने के बाद भी जब कोई नोटफिकेशन नहीं दिखा तो मुझे संदेह हुआ कि यह कुछ और प्रॉब्लम है। नेटवर्क बार पूरे दिख रहे थे। मैंने वही टोटका अपनाया जो आप भी कई बार आजमा चुके होंगे। ऐसी स्थिति में मोबाइल को स्विच ऑफ किया और फिर ऑन कर दिया। जैसे ही नेट ऑन हुआ लगभग डेढ़ सौ के करीब नोटिफिकेशन मेरा इंतजार कर रहे थे। व्हट् स ऐप खोला तो चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल था। महानिदेशक का आदेश देखा तो थोड़ी देर मैं भी असमंजस में पड़ गया। मुझे लगा कि मुझे गाड़ी से उतर लेना चाहिये और वापस लौट जाना चाहिये। मैंने तय किया कि आगे जो भी स्टेशन आयेगा, वहीं उत्तर जाऊंगा। गाड़ी अपनी रफ्तार से दौड़ रही थी। मेरे मन में भी उतनी ही रफ्तार से उथल-पुथल मची थी। मैंने फोन को थोड़ी देर के लिये बंद कर दिया । और आंखें बंद कर ली। उतर कर लौटने पर भी मेरा मन एकदम पक्का नहीं हो पा रहा था। जब धारचूला से मैं इतनी दूर आ ही गया, तो पिकनिक ही सही, मुझे देहरादून जाना ही चाहिये। अगला स्टेशन आने वाला था। मुझे जल्दी से फैसला करना था कि उ...