प्रांतीय अधिवेशन ......भाग-08



...
प्लेटफार्म के गेट पर भीड़ अब थोड़ा कम होने लगी थी। मुझे लगा अब मुझे भी बाहर निकल जाना चाहिये। मैं भी बाहर निकलने वाली लाइन के पीछे खड़ा हो गया। जैसे ही मैं गेट पर पहुंचा, वहाँ पर एक काले कोट वाले ने मुझे रोक दिया।
"टिकिट ?"
"कैसा टिकिट ?" मैंने पूछा।
"ज्यादा स्याणा मत बन, टिकिट निकाल।"
"मैं सच कह रहा हूँ,सर ?"
"किनारे खड़ा हो जा।"
मैं किनारे पर खड़ा हो गया। वह रैंडम्ली लोगों से टिकिट माँग रहा था। लोग अपना टिकिट उसे दिखाते।फिर वह उनको छोड़ देता। इतनी देर में मैं समझ गया यह टीटी होगा। पर मैंने तो सुना था कि टीटी ट्रेन में टिकिट चेक करता था। पहली बार पता चला कि गेट पर भी चेकिंग होती है। वह टिकिट चेक करता रहा,मैं लोगों को देखता रहा। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं तो ट्रेन से आया नहीं, तो इन भाई साहब ने मुझे किनारे क्यों खड़े होने को कहा।
"भाई साहब, मुझे देर हो रही है मैं जाऊँ ?"- मैंने थोड़ी देर किनारे खड़े रहने के बाद कहा।
"चुप चाप खड़े रहो।"- टीटी ने मुझे डांटते हुये कहा।
इतनी जोर से तो मैं अपने स्टूडेंट को भी नहीं डाँटता। मैंने उनके डाँटने के अंदाज का प्रतिरोध किया-" भाई साहब, जरा अपने लहजे पर गौर करें। यह कौन सा तरीका हुआ बात करने का ?"
"अच्छा अभी बताता हूँ, चल मेरे साथ।"- टीटी बोले।
टीटी ने मुझे अपने साथ चलने का इशारा किया।
"पर, क्यों सर ?"- मैंने जानना चाहा।
"चुपचाप मेरे साथ चल, वहीं बताऊँगा।"- टीटी साहब थोड़ा रफ लैंग्वेज इस्तेमाल कर रहे थे।
मैंने ज्यादा न बोलना उचित समझा। और टीटी के साथ चल दिया।
.....


वह मुझे एक ऑफिस नुमा कमरे में ले गये। कमरे में ले जाकर उन्होंने मुझसे सवाल किया-
"बोल, जुर्माना भरेगा या जेल जायेगा ?''
"जेल ! सर ये क्या कह रहे हो आप ? आखिर मैंने किया क्या है ?"
"अबे चल, ज्यादा एक्टिंग नहीं। ऐसी एक्टिंग मैं रोज़ देखता हूँ। बोल चालान काटूँ या जेल जाएगा ?"
अब मैं घबराने लगा था। मैंने हाथ जोड़कर कहा- "सर, मैं सच कह रहा हूँ, मैं तो यहाँ घूमने आया था। मेरा जुर्म क्या है ?"
"बिना टिकिट यात्रा करना।"
"क्या ? सर, मैंने जीवन में पहली बार आज ट्रेन देखी है। यात्रा करने की बात तो मेरे लिये सपने जैसी है। प्लीज सर, मुझे समझने की कोशिश करो।"
तभी मेरी नजर उनके कोट पर लगी नेम-प्लेट पर गया, विकास चतुर्वेदी।
मुझे टीवी में आजकल चल रही डिबेट ध्यान आ गयी-
"विकास तो अभी पैदा ही नहीं हुआ है ?"
"विकास पागल हो गया है ।"
जिनको पूरे देश का मीडिया ढूंढ रहा है, वह जनाब यहाँ टिकिट चेक कर रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि विकास पैदा ही नहीं हुआ। विकास तो लगभग 45 साल का हो गया है। मैंने विकास जी की उम्र का अनुमान लगाया। मेरे दिमाग में अचानक एक खयाल आया कि विकास कहीं वास्तव में पागल हो गया हो, और पागलपन में लोगों के टिकिट चेक कर रहा हो। मैंने खुद को डांटा कि अरे, तेरे जेल जाने की बात हो रही है और तुझे मजाक सूझ रहा है।
"बहाने नहीं। क्यों झूट बोलता है ? शक्ल से तुम ठीक-ठाक लग रहे हो, कपड़े भी तुमने ब्रांडेड पहने हैं। और तुमने ट्रेन पहली बार देखी। तुम्हारी इस कहानी पर कौन यकीन करेगा ?"- टीटी यानी विकास जी ने फिर मुझे डाँटने के अंदाज में पूछा।
दो महीने पहले मैंने लिवाइस की यह जीन्स खरीदी थी। जो आज मेरी सच्चाई को झूठा साबित कर रही थी।
"सर, मैं सच कह रहा हूँ। मैंने रेलवे स्टेशन इससे पहले कभी नहीं देखा था। पास से गुजर रहा था, तो देखने चला आया।"
"ठीक है, थोड़ी देर के लिये मान भी लिया जाय कि तुम सही हो, तो प्लेटफार्म टिकिट दिखाओ ?"
"ये क्या बला हुयी ? प्लेटफॉर्म में घूमने का भी टिकिट होता है ? सोचो सर अगर मुझे रेलवे के बारे में कुछ मालूम होता तो क्या प्लेटफार्म का टिकिट न लेता ?"
पर विकास जी मेरी बात को मानने के लिये तैयार नहीं थे।
हे भगवान, किस घड़ी में शिक्षा विभाग ने कोटिकरण में यह रेलवे के मानक जोड़े। न रेलवे का मानक जुड़ता न मैं रेलवे स्टेशन आता और न यह जेल जाने की नौबत आती। ऊपर से इस रेल ने मेरे स्कूल की श्रेणी भी परिवर्तित हो गयी है।
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(जारी...)....

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