प्रांतीय अधिवेशन ......- भाग-06


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मेरी नजर स्टेशन पर लगी बड़ी-बड़ी डिजिटल घड़ियों पर गयी। वह लाल रंग में 05:16 मिनट का समय बता रही थी। मैंने अपने मोबाइल को निकाला उसमें समय देखा तो मेरा मोबाइल एक मिनट पीछे था। मैंने सोचा जब रेलवे स्टेशन की घड़ियाँ समय सही बता रही हैं तो हमारे यहाँ ट्रेन हमेशा देर से ही क्यों आती हैं। तभी अनाउंसमेंट होने लगा "यात्रीगण कृपया ध्यान दें गाड़ी नंबर 19019 अपने निर्धारित समय से आधा घंटा देर प्लेटफॉर्म न0 4 में आने की संभावना है।" वह अनाउंसमेंट एक अलग प्रकार की आवाज में था। इस प्रकार की आवाज भी मैं पहली बार सुन रहा था। नएपन की बजह से वह आवाज कुछ ज्यादा ही अच्छी लग रही थी।
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थोड़ी दूरी पर मुझे चाय वाला दिखायी दे गया। मैं चाय वाले के सामने वाली बेंच में बैठ गया। मैंने एक चाय का आर्डर दिया और आस-पास देखने लगा। सामने दूर प्लेटफॉर्म के छोर पर, मुझे गाय माता आती दिखायी दी। एक पल के लिये तो मुझे लगा कि कोई गाय को ट्रेन से अपने साथ कहीं ले जा रहा है। फिर मुझे अपने बेवकूफी पर हंसी आयी, भला ऐसा भी कभी हो सकता है ?
अपना हिंदुस्तान भी कितना प्यारा है, यहाँ मनुष्य और जानवर कितने मिलजुल कर रहते हैं। मैं जब ट्रेन पहली बार देख रहा हूँ तो निश्चित है कि मैं कभी किसी यूरोपियन कंट्री तो नहीं ही गया होऊँगा। पर जो कुछ भी पढ़ा-सुना है, उस आधार पर कह सकता हूँ, वहाँ रेलवे स्टेशन पर गाय ? शायद ही सम्भव हो। धीरे-धीरे वह गाय मेरी बेंच की तरफ आ रही थी। किसी ने उसको भगाया नहीं, शायद किसी के पास इतना समय भी नहीं था, कि वह मेरी तरह किसी गाय को नोटिस कर पाता।


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मुझ से पहली बेंच पर तीन सूट-बूट और जीन्स वाले लोग बैठे थे, पर गाय उनके पास नहीं रुकी थी। वह गाय धीरे-धीरे मेरे पास आकर खड़ी हो गयी और मुझे सूंघने लगी। मैं बड़ा ऐम्बैरेस फील कर रहा था। मुझे लगा कि मुझ पर गाँव की घास-फूस की गंध तो नहीं आ रही है ? मैंने इधर-उधर देखा पर किसी ने इस बात को नोटिस नहीं किया। मैंने गाय को भगाना चाहा पर वह भागी नहीं और मेरे बेंच के पास ही लेट गयी। मैंने अपनी दोनों बाहों को नाक के पास ले जाकर सूंघा, तो घास जैसी कोई गंध नहीं आ रही थी। अब मेरा मन गाय के इस व्यवहार का विश्लेषण करने लग गया। क्या इसने पहचान लिया कि मैं सुदूर गाँव से आया हूँ ? या इसने यह पहचान लिया कि मैं उससे बुरा व्यवहार नहीं करूंगा ? मेरे मन में और भी सवाल उठते पर, तब तक मेरी बेंच पर एक लड़का-लड़की आकर बैठ गये।
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लड़की जीन्स-शर्ट में थी, उसने शर्ट के बटन में अपना काले रंग का गॉगल लटकाया था और कान पर हेडफोन लगाये हुये थे। जीन्स दोनों घुटनों में फटी हुयी थी। कपड़ा फटा होना पहले के जमाने में गरीबी की निशानी होती थी। आज फैशन की निशानी है। मैंने थोड़ी देर के लिये खुद को घुटनों से फटी जीन्स में देखने की कोशिश की, तो गाल पर पापा का झन्नाटेदार थप्पड़ महसूस हुआ। मैं तुरंत उस कल्पना से बाहर आ गया। लड़के ने चेक दार शॉर्ट कमीज और जीन्स पहनी थी। पर उसकी जीन्स कहीं से फटी नहीं थी। लड़की ने बेंच में बैठते ही पहले गाय को पुचकारा, उसके सिर व कमर पर हाथ फेरने लगी। मेरी चाय आ गयी थी। मैं चाय पीने लगा। गाय को पुचकारने से जब वह लड़की बोर हो गयी तो वह साथ वाले लड़के के बालों से खेलने लगी। उन दोनों के लिये मेरा उनकी एकदम बगल में होना या आस-पास बैठे लोगों का होना कोई मायने नहीं रख रहा था। वह बिल्कुल सहज और अपने में तल्लीन थे। पर मैं उनके व्यवहार से असहज होने लगा था।
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(जारी...)

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