चाय पर चर्चा-प्रांतीय अधिवेशन ......भाग-11
....11... मैं किनारे की कुर्सी में बैठकर पूरे सम्मेलन का नजारा देखने की कोशिश कर रहा था। बहुत सारे छोटे समूह अपनी-अपनी चर्चा में व्यस्त थे। कुछ लोगों ने मेरी तरह अपनी सीट पहले ही घेर ली थी। मेरे सामने हालांकि अभी भी बहुत सारी कुर्सियां खाली थी। पर आगे की कुर्सियों पर लोग जम गये थे। .... मैंने इधर-उधर नजर दौड़ाई कि कोई जान-पहचान के गुरुजी नजर आ जांय, ताकि मैं कुछ बातचीत कर सकूँ। पर कोई नजर नहीं आया। मेरे चारों तरफ हजारों की भीड़ थी। पर मैं ख ुद को अकेला महसूस कर रहा था। सम्मेलन की इस भीड़ में आने से पहले मैं बिल्कुल अकेला था, तब भी मैंने खुद को अकेला नहीं समझा। पर अब इस भीड़ में मुझे अकेलापन सताने लगा है। भीड़ में और अकेलापन ? आपको मेरी स्थिति पर हंसना आ रहा होगा। पर मैं समझ नहीं पा रहा कि मैं ऐसा क्यों महसूस कर रहा हूँ ? क्या इसकी वजह दुर्गम में लगातार वर्षों से कार्य करना तो नहीं ? क्योंकि जिस स्कूल में मैं कार्य कर रहा हूँ। वहां अस्सी तो कुल बच्चे हैं और वहां एक साथ सौ से ऊपर लोगों का दिखना नामुमकिन सा होता है। अचानक इतनी भीड़ को देखकर मैं घबरा तो नहीं रहा ? .... मैंने अपने अकेलेपन...