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जनवरी, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

चाय पर चर्चा-प्रांतीय अधिवेशन ......भाग-11

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....11... मैं किनारे की कुर्सी में बैठकर पूरे सम्मेलन का नजारा देखने की कोशिश कर रहा था। बहुत सारे छोटे समूह अपनी-अपनी चर्चा में व्यस्त थे। कुछ लोगों ने मेरी तरह अपनी सीट पहले ही घेर ली थी। मेरे सामने हालांकि अभी भी बहुत सारी कुर्सियां खाली थी। पर आगे की कुर्सियों पर लोग जम गये थे। .... मैंने इधर-उधर नजर दौड़ाई कि कोई जान-पहचान के गुरुजी नजर आ जांय, ताकि मैं कुछ बातचीत कर सकूँ। पर कोई नजर नहीं आया। मेरे चारों तरफ हजारों की भीड़ थी। पर मैं ख ुद को अकेला महसूस कर रहा था। सम्मेलन की इस भीड़ में आने से पहले मैं बिल्कुल अकेला था, तब भी मैंने खुद को अकेला नहीं समझा। पर अब इस भीड़ में मुझे अकेलापन सताने लगा है। भीड़ में और अकेलापन ? आपको मेरी स्थिति पर हंसना आ रहा होगा। पर मैं समझ नहीं पा रहा कि मैं ऐसा क्यों महसूस कर रहा हूँ ? क्या इसकी वजह दुर्गम में लगातार वर्षों से कार्य करना तो नहीं ? क्योंकि जिस स्कूल में मैं कार्य कर रहा हूँ। वहां अस्सी तो कुल बच्चे हैं और वहां एक साथ सौ से ऊपर लोगों का दिखना नामुमकिन सा होता है। अचानक इतनी भीड़ को देखकर मैं घबरा तो नहीं रहा ? .... मैंने अपने अकेलेपन...

चाय पर चर्चा-प्रांतीय अधिवेशन ......भाग-12

....12.... माइक से घोषणा हुयी कि हमारे आज के मुख्य अथिति माननीय मुख्यमंत्री जी, बहुत जल्दी हमारे बीच पहुंचने वाले हैं। अतः सभी से अनुरोध है कि अपना स्थान ग्रहण कर लें। यह घोषणा शायद इसलिये की गयी थी, जिससे पांडाल में शिक्षकों की संख्या बढ़ जाय। क्योंकि हमारे शिक्षक नेता बोल रहे थे और कोई उनको सुन नहीं रहा था। सभी छोटे-छोटे समूहों में दूर किनारे, दूसरे मैदान में खड़े थे। पंडाल में मेरी तरह ही लोग थे, जो या तो मेरी तरह अकेले थे या फिर अपनी सीट पहले से ही रिजर्व करना चाहते थे। उस घोषणा से किसी को कोई खास फर्क नहीं पड़ा। सबको पता था कि अभी मुख्यमंत्री जी आने वाले नहीं हैं। क्योंकि यह घोषणा इससे पहले भी दो बार दोहरायी जा चुकी थी। .... मैंने महसूस किया है कि हमारे शिक्षक साथी किसी अधिकारी, विधायक, मंत्री आदि को तो बहुत ध्यान से सुनते हैं। पर अपने अध्यक्ष/मंत्री को सुनना पसंद नहीं करते। ब्लॉक व जिले में तो कई बार जब अध्यक्ष / मंत्री बोल रहे होते हैं तो उनके सामने गिनती के शिक्षक बैठे होते हैं। जब हम ही अपने पदाधिकारियों का सम्मान नहीं करेंगे, तो विभागीय अधिकारी उनको क्या समझेंगे ? यही हाल सं...

चाय पर चर्चा-प्रांतीय अधिवेशन ......भाग-10

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.... मैंने घड़ी देखी तो सुबह के नौ बजे रहे थे। कल रेलवे स्टेशन से छूटने के बाद, छूटना ही हुआ, मैं सीधे होटल वापस आया और जल्दी सो गया था। पर फिर भी नींद देर में खुली। अच्छा ही हुआ कि सारी थकान मिट गई थी। मैं आज का पूरा दिन ताजगी के साथ रह सकता हूँ। मैंने होटल के रिसेप्शन में चाय के लिये फोन लगाया। और फिर बाथरूम में जाकर गीजर ऑन कर दिया। ... नहा-धोकर और नाश्ता करके मैं लक्ष्मण विद्यालय की तरफ चल दिया। इस बार मेरी रेलवे स्टेशन के अंदर से जाने की हिम्मत नहीं हुयी। पता लगा कि कहीं किसी ने फिर पकड़ दिया तो ? मैंने स्टेशन के बाहर से लोगों को पटरी के पार जाते देखा तो मैं भी उनके पीछे-पीछे हो लिया। जब मैं रेलवे कॉलोनी की गलियों से होते हुए मुख्य सड़क में पहुंच गया, एक बार मैंने फिर कन्फर्म करने के लिये किसी राहगीर से पूछा। जबाब मिला कि आप सही रास्ते पर हो, आगे चलते रहो लेफ्ट साइड में आपको लक्ष्मण विद्यालय का बोर्ड दिख जायेगा। मैं चलता रहा और लेफ्ट साइड देखता रहा, मेरे साथ-साथ लेफ्ट साइड में एक गंदा नाला भी बहता हुआ चल रहा था। मैं थोड़ी ही दूर चला था कि मुझे एक दो आदमी उस गंदे नाले में कुछ धुलत...