चाय पर चर्चा-प्रांतीय अधिवेशन ......भाग-11



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मैं किनारे की कुर्सी में बैठकर पूरे सम्मेलन का नजारा देखने की कोशिश कर रहा था। बहुत सारे छोटे समूह अपनी-अपनी चर्चा में व्यस्त थे। कुछ लोगों ने मेरी तरह अपनी सीट पहले ही घेर ली थी। मेरे सामने हालांकि अभी भी बहुत सारी कुर्सियां खाली थी। पर आगे की कुर्सियों पर लोग जम गये थे।
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मैंने इधर-उधर नजर दौड़ाई कि कोई जान-पहचान के गुरुजी नजर आ जांय, ताकि मैं कुछ बातचीत कर सकूँ। पर कोई नजर नहीं आया। मेरे चारों तरफ हजारों की भीड़ थी। पर मैं खुद को अकेला महसूस कर रहा था। सम्मेलन की इस भीड़ में आने से पहले मैं बिल्कुल अकेला था, तब भी मैंने खुद को अकेला नहीं समझा। पर अब इस भीड़ में मुझे अकेलापन सताने लगा है। भीड़ में और अकेलापन ? आपको मेरी स्थिति पर हंसना आ रहा होगा। पर मैं समझ नहीं पा रहा कि मैं ऐसा क्यों महसूस कर रहा हूँ ? क्या इसकी वजह दुर्गम में लगातार वर्षों से कार्य करना तो नहीं ? क्योंकि जिस स्कूल में मैं कार्य कर रहा हूँ। वहां अस्सी तो कुल बच्चे हैं और वहां एक साथ सौ से ऊपर लोगों का दिखना नामुमकिन सा होता है। अचानक इतनी भीड़ को देखकर मैं घबरा तो नहीं रहा ?
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मैंने अपने अकेलेपन को दूर करने के लिये अपना फोन निकाला और व्हट्स ऐप चेक करने लगा। मैं जहां कार्य करता हूँ वहाँ मैं अकेला रहता हूँ। स्कूल के बाद के खाली समय में बहुत अकेलापन महसूस होता है। जब भी मैं ऐसा महसूस करता हूँ, फेसबुक या व्हट्स ऐप चेक करने लगता हूँ। छुट्टी के बाद औसतन हर दस मिनट बाद मैं ऐसा करता हूँ। अखबार तो मेरे यहाँ पहुँचता नहीं,पर नेट में ही एक अखबार में मैंने पढ़ा था कि ऐसा करना एक प्रकार की बीमारी है। मुझे लगता है इस बीमारी से मैं ही नहीं, लगभग हर दुर्गम का शिक्षक ग्रसित है। दुर्गम में कार्य करने वाले शिक्षक सामान्यत: अकेले ही रहते हैं, परिवार से दूर। जब से स्मार्टफोन आये और फेसबुक, व्हट्स ऐप जैसे सोसल प्लेटफार्म उपलब्ध हुये। दुर्गम के शिक्षकों के अकेलेपन का साथी उनका स्मार्टफोन हो गया। आपने देखा होगा शिक्षकों के व्हट्स ऐप, फेसबुक में जितने भी ग्रुप हैं, उनमें दुर्गम के शिक्षकों से ही चहल-पहल बनी रहती है। अकेले रहते हैं तो कुछ न कुछ पोस्ट करते रहते हैं। उनके पास वास्तविक दुनियां के यार-दोस्त,परिवार,बाजार तो होते नहीं, इसलिये वह इस आभासी दुनियाँ में व्यस्त हो जाते हैं। सुगम के साथी तो वास्तविक दुनिया के यार-दोस्तों, बाजार व अपने परिवार, रिश्तेदारों में व्यस्त रहते हैं। इसलिये फेसबुक, व्हट्स ऐप जैसी आभासी दुनियां के लिये उनके पास समय ही नहीं होता। यही कारण है कि छुट्टियों में शिक्षकों के फेसबुक, व्हट्स ऐप ग्रुप वीरान हो जाते हैं। दुर्गम में अकेलापन काटने के लिये पहले एक ही साधन था दारू। पर अब दूसरा साधन भी आ गया स्मार्टफोन।
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( जारी..)

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