चाय पर चर्चा- प्रांतीय अधिवेशन ......भाग-17



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"खैर छोड़ो, यह बताइये कि निकिता आपके और भाभी के बीच कैसे आयी ?"- मैंने जानबूझ कर यह सवाल किया। जिससे कहानी को ज्यादा न सुनना पड़े। हम सीधे मुद्दे की बात पर आयें। और अगर मेरे पास महावीर जी की समस्या का कोई हल है, तो उनको जल्दी से सुझाऊँ।
"निकिता ही तो तुम्हारी भाभी है।"- महावीर जी ने कहा।
"क्या ?"- मैंने आश्चर्य से पूछा।
"जैसा कि होता ही है। कई बार ना,कई बार हाँ, करते करते,आखिर मेरी और निकिता की शादी हो ही गयी।"- महावीर जी बोले।
"पर फिर अब इतनी जल्दी तलाक की नौबत क्यों आ गयी ?"- मैंने पूछा।
"शुरू में सब कुछ अच्छा चल रहा था। हनीमून के लिये उसने गोआ जाने की इच्छा की,तो हम वहाँ गये। खूब घूमे फिरे । जब हम वापस लौटे और मैं अपनी ड्यूटी आया तो उसको बहुत खराब लगा था। वह रोने लगी थी। जैसे नई-नई शादी में होता ही है, दिन में कई बार फोन करना। वही एक जैसी बातें हर बार करना। आपने खाना खा लिया,स्कूल पहुंच गये, क्या कर रहे हो ? स्कूल से घर पहुंच गये? वगैरा वगैरा।"
......


महावीर जी का बोलते-बोलते पहली बार गला भर आया। वह थोड़ी देर के लिये चुप हो गये। मैंने भी उनसे कुछ बोलना अच्छा नहीं समझा। मैं कहना चाहता था कि महावीर जी, मुख्यमंत्री जी आ गये होंगे। हमको चलना चाहिये। कहानी बाद में सुनेंगे। पर उनकी स्थिति को देखकर कम से कम इस समय ऐसा कहना मुझे उचित नहीं लगा। मैंने बैठे-बैठे चाय वाले को आवाज लगायी। "भाई साहब! एक-एक चाय और पिला दीजिये।"
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"शुरू में जब वह फोन करती, तो बार-बार घर आने को कहती। पर इतनी दूर से दो या तीन महीने में ही घर आना-जाना होता था। लोग कहते हैं कि शिक्षकों के पास तो बहुत छुट्टियां होती हैं। कहाँ होती हैं छुट्टियां ? जो भी होती हैं, गर्मियों और सर्दियों में, वह थोपी गयी छुट्टियां होती हैं। जब हमको जरूरत नहीं होती, तब होती हैं। साल में मात्र चौदह छुट्टियाँ ही तो ऐसी होती हैं, जिनको हम अपनी मर्जी से ले सकते हैं। फिर भी जैसे-तैसे संडे या किसी अन्य छुट्टी के साथ अपनी सीएल एडजस्ट करके मैं घर गया। घर जाता तो वह बहुत खुश होती। उसको रेस्टोरेंट का खाना ज्यादा पसंद था। हम अच्छे से अच्छे रेस्टोरेंट में खाना खाते। जिंदगी आनंद से बीत रही थी।"- इतना कहने के बाद महावीर जी फिर चुप हो गये।
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"फिर क्या हुआ ?"- मैंने पूछा।
"हमारी खुशी को किसी की नजर लग गयी। पिछले जून की छुट्टियों में उसने शिमला घूमने की योजना बना डाली। पर मैंने स्वास्थ्य खराब होने का बहाना बनाकर टाल दिया। उसने कहा ठीक है जब आपकी तबियत ठीक हो जायेगी तो चलेंगे। मैंने कहा ठीक है। एक हफ्ते बाद उसने फिर शिमला जाने का जिक्र कर दिया। पर मैं शिमला जाना ही नहीं चाहता था। नहीं, जाना नहीं चाहता था, कहना गलत होगा। बल्कि यह कहना उचित होगा कि मैं शिमला नहीं जा सकता था।"
"क्यों आप शिमला क्यों नहीं, जा सकते थे ?"- मैंने पूछा।
"शिमला न जा सकने की भी एक कहानी है। इसी कहानी ने हमारे बीच इतनी दूरियाँ पैदा कर दी हैं।"- महावीर जी ने कहा।
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(जारी....)

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