उत्तरवन का शिक्षक दिवस..भाग-1



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उत्तरवन में आज फिर काफी चहल पहल दिख रही थी। पत्रकार पोपट लाल खबर की तलाश में घूम रहे थे। इस गहमा-गहमी से उनको खबर की गंध आ गयी। जानवर दो-दो चार-चार के झुंड में खड़े नजर आ रहे थे। पुलिस वाले भी जगह-जगह पर दूर दूर तक खड़े थे। जो आने-जाने वाले वाहनों को मुख्य मार्ग से दूसरी तरफ डाइवर्ट कर रहे थे। इन दृश्यों को देखकर पोपट लाल को इतना तो आईडिया हो गया कि आज यहां कुछ स्पेशल है और अच्छी खासी खबर, अखबार के मुख पृष्ठ लायक मिलने की संभावना है।
पत्रकार पोपट लाल एक झुंड के समीप गये। उनसे पूछने पर पता चला कि सामने के सरकारी स्कूल में आज शिक्षक दिवस के मौके पर उत्तरवन के शिक्षा मंत्री पधार रहे हैं। पत्रकार पोपट लाल जी ने स्कूल के अंदर प्रवेश किया तो वहां सारी तैयारियाँ हो चुकी थी। स्कूल के बाहर टैंट लगवाया गया था। परन्तु टैंट लगाने वाले ने टैंट को थोड़ा पीछे लगा दिया था। इस कारण स्कूल की खिड़कियों के टूटे हुए पट्टे और बरामदे में बड़े-बड़े गड्ढे सब का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित कर रहे थे। एक गड्ढे में तो कल की बारिश का पानी अभी भी जमा था। कुछ छोटे बच्चे उसमें अपनी कागज की नाव को तैरा रहे थे। पोपट लाल जी के मुँह से 'वाऊ' निकल गया। पोपट लाल जी को लगा कि यह गड्ढे जानबूझकर बनाये गये हैं, जिससे बच्चे उसके पानी में खेलने का प्राकृतिक आनंद ले सकें। वह इस बात को लेकर प्रधानाचार्य की तारीफ करना चाहता थे कि क्या कमाल का कॉन्सेप्ट है। वह इधर-उधर प्रधानाचार्य कक्ष को ढूढ़ने लगे। तभी उनका ध्यान किसी को डपटने जैसी आवाज पर गया। एक सज्जन किसी को डांट पिला रहे थे।
"कैसे जानवर हो तुम ? तुम्हारे यहाँ मंत्री जी कार्यक्रम है, तुम यह फर्श के गड्ढे नहीं भरवा सकते थे ?"
--"जी सर, जो पैसा निधियों में था, वह सारा खर्च हो गया। टैंट वाले ने बिना पैसे दिये, टैंट लगाने से साफ मना कर दिया था। उसको सारा पैसा नगद देना पड़ा। सर कुर्सियों व चाय-पानी का जो खर्चा है वह सब मुझे अपनी जेब से करना पड़ रहा है। पहले पीटीए अध्यक्ष ने टैंट के कुछ पैसे देने की हामी भरी थी अब वह भी मुकर गये।"
"अरे,ये गड्ढा कल ही कल तो हुआ नहीं होगा ? ये खिड़की-दरवाजे भी कल तो टूटे नहीं होंगे ? तुमने इनकी मरमत्त के लिये कोई प्रस्ताव क्यों नहीं भिजवाया ?"

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--"भिजवाया था सर, कहो तो मैं अभी वह फ़ाइल लाता हूँ। मरमत्त क्या, मैंने तो पूरी नयी बिल्डिंग के लिये ही प्रस्ताव भिजवाया था। यह बिल्डिंग कभी भी टूट सकती है सर। बारिश के दिनों, पूरे दिन, छुट्टी तक दिल धौंकनी की तरह धड़कता है,सर।"
"अरे, इस आदमी को मेरे सामने से हटाओ। नहीं तो मैं आज ही शिक्षक दिवस के दिन इसको सस्पेंड कर दूँगा। शिक्षाधिकारी कौन है उसको बुलाओ !"
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पोपट लाल ने इतनी देर में डांटने वाले व डांट खाने वाले व्यक्ति का परिचय अगल-बगल 'डांट रस' का आनंद उठाने वाले जानवरों से ले लिया था। पता चला कि डांटने वाले उत्तरवन के जिलाधिकारी जम्बू हाथी व डांट खाने वाले इस स्कूल के प्रिंसिपल चिंटू खरगोश थे। पत्रकार पोपट लाल जिन गड्ढों को बच्चों के लिये जानबूझ कर बनाया समझ रहे थे,वह ठेकेदार द्वारा कम रेत-सीमेंट डाले जाने के कारण स्वतः बन गये थे। स्कूल की इस बिल्डिंग को बने अभी तीन-चार साल ही हुये थे। फर्श में जगह-जगह गड्ढे हो गये थे और दीवार का पलस्तर भी जगह-जगह से टूट कर गिर चुका था। ध्यान से देखने पर उखड़ी हुई रेत की जगह मॉडर्न आर्ट की कलाकृतियाँ नजर आ रही थी। पत्रकार पोपट लाल सोच रहे थे कि इस प्रकार की कलाकृतियों की भी प्रदर्शनी लगनी चाहिये,परन्तु फिर उन्होंने खुद ही अपने विचार को बदल दिया कि स्कूल की इन बिल्डिंग्स को प्रदर्शनी स्थल पर ले कैसे जायेंगे ?
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जारी....
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