‌उत्तरवन का शिक्षक दिवस..भाग-2



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शिक्षा अधिकारी बिट्टू चीता, जिलाधिकारी जम्बू हाथी के सामने पहुंच चुके थे। ऐसा लग रहा था कि अब डांट खाने की बारी उनकी है।
"क्यों जी, क्या तुमने अपने प्रिंसिपल को बात करने की तमीज नहीं सिखायी ? इनको यह भी नहीं मालूम कि अपने से बड़े अधिकारियों से कैसे बात की जाती है ?"
--"सॉरी सर। उनकी तरफ से मैं आपसे माफी मांगता हूँ।"
जिलाधिकारी जम्बू हाथी के दिल में, शिक्षाधिकारी बिट्टू चीता के माफी मांगने से थोड़ा-थोड़ा ठंडक महसूस होने लगी। उनकी आवाज थोड़ा नरम पड़ने लगी।
"देखो ! जल्दी से यह गड्ढे भरो और सुनो वो सामने स्कूल की टूटी हुई खिड़कियों का कुछ करो।"- जिलाधिकारी बोले।
--"जी सर। आप परेशान न हों मैं अभी व्यवस्था करता हूँ।"
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शिक्षाधिकारी बिट्टू चीता प्रिंसिपल कक्ष की तरफ बढ़े । उनको देखकर कर लग रहा था कि प्रिंसिपल चिंटू खरगोश को एक दौर की और डांट खानी पड़ेगी। शिक्षाधिकारी बिट्टू चीता जो अभी तक जिलाधिकारी के सामने शांत नजर आ रहे थे। उनका चेहरा,उनसे दूर हटते ही,तमतमाया हुआ लग रहा था। उन्होंने तेजी से प्रिंसिपल के कक्ष में प्रवेश किया। परन्तु वहाँ प्रिंसिपल चिंटू खरगोश को न पाकर और क्रोधित हो गये- "मंत्री जी आने वाले हैं और यह जनाब फिर गायब हो गये। उन्होंने प्रिंसिपल की मेज में रखी घण्टी बजायी। परन्तु कोई नहीं आया। अब उनका गुस्सा सातवें आसमान में पहुंच गया था। उन्होंने फिर घण्टी बजायी, तो बंटी खरगोश प्रिंसिपल कक्ष में दाखिल हुआ। वह उस पर ही टूट पड़े -"कैसे चपरासी हो तुम! मैं एक घण्टे से घण्टी बजा रहा हूँ, तुमको सुनाई नहीं दे रहा ?"
"जी..जी..."
"अब ये मिमियाना बंद कर,तुम्हारे प्रिंसिपल कहाँ चले गये ?"
"जी...जी...सर...पीछे टॉयलेट में ....।"
"तुम खरगोश लोग कितनी टॉयलेट करते हो यार, कितनी देर से मैं उसका इंतजार कर रहा हूँ। टॉयलेट कहाँ है ? चलो मेरे साथ।"
"जी...सर...।"
शिक्षा अधिकारी बिट्टू चीता,मंटी खरगोश के साथ टॉयलेट की तरफ गये। वहां क्या देखते हैं कि प्रिंसिपल चिंटू खरगोश लैटरिंग की शीट साफ कर रहे हैं। शिक्षा अधिकारी सकपका गये। उन्होंने मंटी खरगोश की तरफ आँखे तरेरी- "तुम कैसे चपरासी हो, तुम्हारे प्रिंसिपल सफाई कर रहे हैं और तुम इधर-उधर घूम रहे हो ?"
"साब,उनको डांटिये मत,न मैं प्रिंसिपल हूँ और न ये चपरासी है।"- चिंटू खरगोश ने कहा।
"तो तुम कौन हो ?"- शिक्षा अधिकारी चिल्लाये।
"मैं हिंदी का प्रवक्ता हूँ,और मेरे पास प्रिंसिपल का प्रभार है। बारह साल हो गये हैं मुझे यह प्रभार संभाले हुये। बीच में दो बार स्थायी प्रिंसिपल आये, वह भी दो-दो महीने के लिये, फिर रिटायर हो गये। जिनको आप चपरासी समझ रहे हैं ये मंटी जी हैं, राजनीति विज्ञान के प्रवक्ता।"- प्रिंसिपल चिंटू खरगोश ने शांत लहजे में कहा।
"क्या ? फिर तुम्हारा चपरासी कहाँ गया ?"
"साब एक मात्र चपरासी था,वह भी पिछले चार सालों से मंत्री जी के साथ अटैच है। जब वह स्कूल में भी था। तब भी वह सफाई का कार्य नहीं करता था। कहता था कि मैं चपरासी हूँ, स्वीपर नहीं ? सफाई करने का कार्य मेरी सेवा शर्तों में नहीं है। साब,सरकारी अध्यापक ही ऐसे हैं जिनकी सेवा शर्तों में सब कुछ करना लिखा है। इसलिए यह कार्य हम खुद ही कर लेते हैं।"
"चुप करो,ज्यादा भाषण मत दो। तभी साब कह रहे थे कि तुमको बात करने की तमीज नहीं है ? अपने से बड़े अधिकारी से भला ऐसी बात की जाती है ?किसी स्वीपर को बुला लेते ?"
"साब,जैसा बच्चों को पढ़ाते हैं वैसा बोलने की आदत हो जाती है। मुझे पता नहीं था कि सच बोलना बदतमीजी में आता है। सॉरी सर।....स्वीपर शहर में तो मिल जाते हैं। पर यह गांव है,आप कितना भी पैसा दे दो, यहाँ कोई भी इस कार्य को करने को तैयार नहीं होता।"
"ठीक है ठीक है,जल्दी से यह निबटाओ।"
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"यार ये आदमी बहुत दिमाग खाता है, इसको समझाओ प्रैक्टिकल बनो, प्रैक्टिकल..." यह कहते हुये,मंटी खरगोश को, शिक्षाधिकारी जी ने अपने पीछे आने का इशारा किया। अब मंटी खरगोश और शिक्षाधिकारी जी फर्श में हुये उन गड्ढों को भरने पर विचार कर रहे थे।
"सर,मुझे लगता है कि इन गड्ढों को भरना इतने कम समय में संभव नहीं है। ऐसा करते हैं इस बरामदे के आगे एक बड़ा और अच्छा सा पर्दा टांग देते हैं। जिससे यह गड्ढे और खिड़कियों के टूटे हुये पट्टे दिखाई नहीं देंगे।"- मंटी खरगोश ने अपना सुझाव दिया।
"जो भी करना है,जल्दी करो मंत्री जी आने ही वाले हैं।"- शिक्षा अधिकारी बिट्टू चीता बोले।
"जी सर,मैं अभी व्यवस्था करता हूँ।"- मंटी खरगोश ने कहा।
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जारी....
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