कोरोना वायरस..भाग-3
लॉक-डाउन में, मैं जब दूध लेने दुकान में पहुंचा तो दुकान के बाहर जमीन में लगभग एक-एक मीटर की दूरी पर, चूने से सफेद-सफेद गोले बनाये गये थे। पर दुकान पर खड़ा, कोई भी ग्राहक, उन गोलों की तरफ देख भी नहीं रहा था। जो भी लोग उन गोलों के अंदर खड़े थे, वह मजबूरी में खड़े थे। क्योंकि उनसे आगे, भीड़ के कारण, खड़े होने की जगह ही नहीं थी। लोग इतने पास-पास खड़े थे कि एक मीटर तो छोड़ो, उनके बीच एक सेंटीमीटर की दूरी भी न निकलती।
जैसे हम हिंदुस्तानी हेलमेट दुर्घटना से बचने के लिये नहीं, पुलिस से बचने के लिये पहनते हैं। वैसे ही उनको पता था कि यह गोले दुकानदार ने उनके लिये नहीं, बल्कि पुलिस के लिये बनाये हैं। जिससे पुलिस वाले दुकान का चालान न कर पाएं। मैं नियमानुसार सबसे पीछे वाले व्यक्ति से एक मीटर की दूरी पर खड़ा हो गया। तब तक दो तीन लोग आये और मेरे आगे खड़े हो गये। मुझे हमेशा से भीड़ से डर लगता है इसलिये, मैं चुप-चाप उनसे एक मीटर और पीछे खिसक गया। पर तब तक दो तीन और लोग आये और मुझसे आगे खड़े हो गये। मेरी आदत ऐसे मामलों में प्रतिकार करने की कम है, इसलिये मैं चुप रहकर पीछे हटता चला जा रहा था।
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तभी लाइन में खड़े-खड़े मुझे एक घटना याद आ गयी। मेरी नई-नई शादी हुई थी। पत्नी ने फरमाइश की कि मुझे पिक्चर देखनी है। मैंने कहीं पढ़ा था, कि नये-नये दूल्हे, पत्नी के लिये, आसमान के चांद-तारे तोड़ लाते हैं। मैंने सोचा, यार शुक्र है कि इसने चांद-तारे लाने के लिये नहीं कहा। क्योंकि उस समय आसमान में तारे नहीं हुआ करते थे। प्रदूषण इतना होता था कि तारे आसमान में बहुत कम उगा करते थे। तारों को तोड़ना तो बाद की बात होती थी, पहले हफ़्तों तो उनको ढूंढने में लग जाते थे। जो आजकल यह नीला आसमान दिखाई दे रहा है और इसमें जो तारे टिमटिमाते दिख रहे हैं, वह सब '#नोवेल कोरोना वायरस' की बजह से है। प्रदूषण कम हो गया है। तारे दिख रहे हैं और चमक भी रहे हैं। वह आजकल टिमटिमा कर खूब मस्तियां कर रहे हैं। उनकी मम्मियां भी उनको घर से निकलने के लिये मना नहीं कर रही हैं। उनको भी पता है आजकल कोरोना वायरस की बजह से शादी-ब्याह तो हो नहीं रहे। कोई भी नया-नया दूल्हा तारे तोड़ने नहीं आएगा। प्रेमी-प्रेमिकाएं मिल नहीं पा रहे, इसलिये कोई भी प्रेमिका, प्रेमी से, तारे तोड़ लाने की फरमाइश नहीं कर पायेगी। इसलिये वह मस्त होकर आसमान में उछलकूद कर रहे हैं। वैसे आजकल शाम को, बच्चों के साथ, छत या बालकोनी में जाकर उनकी मस्तियां जरूर देखा करो। बच्चों के साथ-साथ आपको भी बड़ा आनंद आयेगा। और हाँ, अगर आप टीचर हैं और किसी बच्चे ने वायु प्रदूषण को कम करने के उपायों के रूप में 'नोवेल कोरोना वायरस' को भी लिख दिया तो उसके नंबर काटना मत।
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तो हाँ, मैं बात कर रहा था कि मेरी नई-नई धर्मपत्नी ने मुझसे पिक्चर चलने की फरमाइश कर दी। यूँ तो मुझे पिक्चर देखना पंसद नहीं था। पर पत्नी ने फरमाइश की थी, तो हम सहर्ष तैयार हो गये। पत्नी को अपने प्रेम से निहाल करने का इससे अच्छा मौका कहाँ मिलता। हम दोनों तैयार होकर चल दिये। पत्नी को हीरो की तरह हाथ पकड़कर विक्रम में पहले बिठाया, फिर खुद बैठकर पिक्चर हॉल की तरफ चल दिये। पिक्चर हॉल पहुंचने पर विक्रम से पहले खुद उतरे और फिर हीरो की तरह हाथ पकड़कर पत्नी को भी धीरे से उतार दिया। उस समय ऐसा लग रहा था कि जिस फ़िल्म को हम देखने जा रहे हैं, उसके हीरो-हीरोइन हम ही हैं। विक्रम से उतरकर, पत्नी ने अपना हैंड पर्स भी हमको थमा दिया। पत्नी के पर्स को पत्नी का प्यार समझकर हमने सहर्ष ग्रहण कर लिया। हम उनका पर्स और एक हाथ पकड़कर हौले-हौले पिक्चर हॉल की तरफ बढ़ चले। उस समय पत्नी का पर्स मेरे हाथ में देख कई लोग मेरी तरफ देख मुस्करा रहे थे। पर हम इसको पत्नी के प्रेम का प्रसाद समझ रहे थे।
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पिक्चर हॉल पहुंचे तो देखते हैं कि टिकिट खिड़की पर टिकिट के लिये लंबी लाइन लगी थी। जैसे कि मैंने आपको बताया कि मुझे भीड़ से बड़ा डर लगता है। इसलिये भीड़ को देखकर मेरी हिम्मत ने जबाब दे दिया। मुझे लगा कि इससे सरल तो तारे तोड़ लाना ही था। थोड़ी देर पहले हीरोगिरी का जो अहसास हो रहा था। वह गुब्बारे में पिन चुभने के बाद निकलने वाली हवा की तरह धीरे-धीरे निकलने लग गया था। पत्नी ने अपना पर्स मेरे हाथ से झटकने के बाद लगभग मुझे धकेलते हुये कहा। जाओ,टिकिट लाओ देख क्या रहे हो ? जैसे-तैसे बजरंग बली का नाम लेते हुये, हमने भीड़ में घुसने का प्रयास किया। पर लोगों के धक्कों ने हमको दूसरी तरफ गिरा दिया। आधा घण्टे के बाद भी हम अपनी जगह से एक इंच आगे नहीं खिसक पाये थे। अब आप में से कई सोच रहे होंगे कि तुम सच में बेवकूफ ही थे। टिकिट ऑनलाइन बुक कर देते। पर आप लोगों की जानकारी के लिये बता दूं, तब सारी लाइन 'ऑफ' ही हुआ करती थी 'ऑन' नहीं।
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मेरी पत्नी सारा माजरा देख रही थी। वह समझ गयी अगर इस आदमी के भरोसे रहूँगी, तो आज फ़िल्म नहीं देख पाऊँगी। उसने मुझे इशारा किया इधर आओ। मैंने उसको कहा कि मैं कोशिश कर तो रहा हूँ, तुम चिंता मत करो। तुम्हारी कोशिश को मैं आधे घण्टे से देख रही हूँ। आधा इंच तो अपनी जगह से हिल नहीं पाये, और कोशिश कर रहा हूँ।
तुम यह पर्स पकड़ो। मैं टिकिट लाती हूँ। वह दस मिनट में टिकिट लेकर लौट आयी। टिकिट लाने के बाद, उसके चेहरे पर जो भाव था। उसमें साफ लिखा दिख रहा था कि मेरे घर वालों ने मुझे किसके पल्ले बांध दिया। जो आदमी मेरे लिए एक पिक्चर का टिकिट अरेंज नहीं कर सकता। वह गृहस्थी को कैसे अरेंज करेगा। इस भाव ने तो गुब्बारे की रही सही हवा भी निकाल दी थी। मैं उसके बाद पूरे सिकुड़े हुये गुब्बारे की तरह फ़िल्म के अंत तक सिकुड़कर बैठा रहा। वह दिन था और आज का दिन मैंने पिक्चर हॉल में कदम नहीं रखा।
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आज भी मुझे लाइन में खड़े-खड़े आधा घण्टा होने वाला था। जैसे ही मैं अपने आगे वालों से पीछे हटता, तब तक और लोग मेरे आगे खड़े हो जाते। पिक्चर हॉल की घटना की याद ने मुझे भीतर से ललकारा। मुझे लगा कि ऐसे में तो अब काम चलने वाला नहीं, मुझे कुछ बोलना ही पड़ेगा। जैसे ही मैं पीछे हटा, एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति मेरे आगे आने की कोशिश करने लगा। मैंने कहा-"भाई साहब पीछे लाइन में खड़े होईये। आगे कहाँ घुस रहे हो ?"
"ये अंकल, मुझे लगा आप लाइन में खड़े नहीं हो।"- उस अधेड़ व्यक्ति ने कहा।
मैं भीतर से जल भुन गया। यह व्यक्ति मुझसे उम्र में कम से कम 15 साल बड़ा लग रहा है और मुझे अंकल कह रहा है। मेरी जगह अगर कोई मेरी उम्र की महिला होती, और यह उसको आंटी कहता, तो वह इसका खोपड़ा फोड़ देती। इस बुढ़ापे में भी खुद को बच्चा समझ रहा है। मैंने खून का घूँट पीते हुये कहा - "आपको दिखाई नहीं दे रहा कि मैं लाइन में खड़ा हूँ ?" मेरी आवाज कुछ तल्ख थी।
"अरे, अंकल ! अब लाइन से एक किलोमीटर दूर खड़े होओगे, तो कैसे पता चलेगा कि तुम लाइन में खड़े हो ?"- उसने कहा।
फिर अंकल, मुझे अब गुस्सा आने लगा था। मैंने खुद को समझाया कि अंकल ही तो बोल रहा है, बोलने दे। इग्नोर कर। क्यों खून जलाए जा रहा है। अबकी बार मैंने शांत होकर कहा - "यह चूने के निशान दिख रहे हैं आपको ? यह इसलिये हैं कि सोशल डिस्टेंसिंग बनी रहे। फिलहाल कोरोना से बचने का यही एक उपाय है। तुमको यह एक मीटर की दूरी, एक किलोमीटर दिखाई दे रही है ? कभी स्कूल गये हो या नहीं ?"
"यह और लोग भी खड़े हैं ? यह तो पास-पास खड़े हैं। सफेद निशान तो इनके लिये भी हैं। मुझे लगता है कि तुमको मरने से बहुत डर लगता है ? अरे, कोरोना-वोरोना से क्या डरना ? देखो, मैंने कोई मास्क भी नहीं लगा रखा। अरे, मौत जिस दिन आनी होगी, आ जायेगी, मौत से क्या डरना ?"- उसने लापरवाही से कहा।
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लोग हमारी बहस को सुन रहे थे। पर किसी ने उसको यह नहीं कहा कि तुम गलत तो कर ही रहे थे, बोल भी गलत रहे हो। अब ऐसे लोगों को क्या समझाएं कि कोरोना से केवल तुम मरते, तो कोई बात नहीं थी। तुम खुद तो मरोगे ही, अपने परिवार, अड़ोसी-पड़ोसी को भी साथ लेकर जाओगे।
तभी पुलिस आ गयी। सभी में हबड़-तबड़ मच गई। दुकानदार ने भी सभी को कहा, गोले में खड़े रहो बाकी हट जाओ। मैं ऑलरेडी गोले में खड़ा था, इसलिये मुझे भागने या हटने की जरूरत नहीं थी। और लोग सभी लाइन से किनारे हो गये और पीछे चले गये।
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मुझसे बहस कर रहे शख्स को भी लाइन से अलग होना पड़ा। अजीब बात थी, जो आदमी अभी मौत से न डरने की बात कर रहा था। वह पुलिस के डंडों से डर गया। उस शख्स व अन्य लोगों की हबड़-तबड़ को देखकर मेरे दिमाग में सवाल आया कि हम हिंदुस्तानी 'सेल्फ डिसिप्लेन' कब सीखेंगे ? हम को जानवरों की तरह जब तक पुलिस नहीं हांकती, तब तक हम सुधरते क्यों नहीं ?
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साथियों! यह तो एक पोस्ट है। इसमें पुलिस की इंट्री करवाना न करवाना मेरे हाथ में था। पर हर जगह और हर बार पुलिस का पहुंचना सम्भव नहीं है।इसलिये जागरूक लोगों को ही 'सोशल डिस्टेंसिंग' की यह व्यवस्था स्थापित करवानी होगी। क्योंकि इसकी जरूरत 'लॉक-डाउन' समाप्त होने के बाद भी पड़ने वाली है। इसलिये अपने आस-पास के ऐसे 'समाजघाती' लोगों को समझाइये। जो भी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन न करे, उसको उसके इस कार्य के लिये हतोत्साहित कीजिये। प्लीज चुप मत रहिये। तभी हम कोरोना को हरा पाएंगे। नमस्कार।
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# corona virus
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