चाय पर चर्चा- प्रांतीय अधिवेशन ......भाग-18
..18.. "जैसे मैंने कहा कि मैं शिमला नहीं जा सकता था। मैंने उसके सामने, उसके मायके, चंडीगढ़ जाने का प्रस्ताव रखा। पर उसने मना कर दिया। नहीं जी, मुझे तो शिमला ही जाना है। उसकी इस जिद से मुझे गुस्सा आ गया।" "मैंने उसको कई बार समझाया कि निकिता जिद मत करो। मैं शिमला नहीं जा सकता बस। मैं तुम्हारा नौकर नहीं हूँ, जो तुम्हारी हर बात मानता रहूँ। जब मैंने कह दिया कि शिमला नहीं जाना है, तो नहीं जाना है। बाकी तुमको जाना है, तो खुद चली जाओ। गुस्से में और भी न जाने क्या-क्या कह दिया।" "यह सुन निकिता को भी गुस्सा आ गया। तो क्या मैं तुम्हारी नौकरानी हूँ, जो तुमको और तुम्हारे घर वालों को खाना खिलाती हूँ। तुम्हारे कपड़े धुलती हूँ। अपने घर में एक गिलास भी नहीं उठाती थी मैं। तुम्हारे घर में महरी बन चुकी हूँ मैं, महरी, समझे ?" ..... "चार-पांच दिन तक हमारे बीच बातचीत बिल्कुल बंद रही। सुलह का कोई रास्ता नहीं मिल रहा था। मेरे पास एक ही रास्ता था कि मैं शिमला जाने के लिये तैयार हो जाऊं। पर कई बार सोचने के बाद भी मैं खुद को तैयार नहीं कर पाया। मैं मजबूर था। शिमला जाना और वह ...