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चाय पर चर्चा- भाग-4

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...... भाग-4 ...... "आप कह रहे कि हैं यह स्कूल बंद नहीं होने चाहिए। इन स्कूलों में मुश्किल से चार या पांच बच्चे पढ़ रहे हैं। आपको नहीं लगता कि इन विद्यालयों को चलाते रहने पर सरकार को काफी नुकसान होगा" यह सवाल पहले वाले सज्जन ने किया। जिन्होंने इस चर्चा की चिंगारी को सुलगाया था। तब तक उन तीसरे भाई साहब का फोन आ गया। "हेलो..हेलो... आवाज नहीं आ रही...आवाज रुक-रुक कर आ रही है...।" (....................................) "हां, हां मैं रजनीश बोल रहा हूँ....।" मैं केवल एक तरफ की आवाज सुन पा रहा था। तो इन भाई साहब का नाम रजनीश है, यह मुझे पता चल गया। "नहीं यार...मैंन वहाँ छोड़ दिया...।" (....................................) "कुछ भी और कर लूँगा....." "कुछ भी............." (....................................) "जो मन को अच्छा लगेगा" (....................................) "इस समय ? इस समय तो मैं चाय पी रहा हूँ।" (....................................) "ओके, बाय... बाद में बात करता हूँ" ...... "दे...

चाय पर चर्चा

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...... भाग-3 ...... मुझे लगा कि यह तीसरे व्यक्ति जरूर कोई सरकारी अध्यापक होंगे और इनको उन दोनों की बात बुरी लग गयी होगी। मैंने उनके पहनावे का जायजा लिया। उन्होंने आसमानी कलर की फेडेड जीन्स और नेवी ब्लू रंग की शर्ट के साथ टाई पहनी थी। कम से कम एक सरकारी शिक्षक होने के उनके चांस काफी कम लग रहे थे। रही सही कसर उनके मशरूम कट बालों ने पूरी कर दी थी और उनके सरकारी शिक्षक होने के चांस लगभग जीरो हो गये थे। अब मेरा ध्यान और अतिरिक्त रूप से उनकी तरफ हो गया। सरकारी शिक्षक के साथ भी क्या कोई खड़ा हो सकता है ? मुझे आश्चर्य हो रहा था।  "इसमें आधार की क्या बात है?" दूसरे वाले ने कहा। "देखिये, यूँ ही किसी बात को कहना उचित नहीं है।" तीसरे सज्जन ने समझाना चाहा। "आये दिन तो अखबारों में सरकारी स्कूलों के बारे में छपता रहता है। इससे बड़ा आधार और क्या हो सकता है?" दूसरे सज्जन  बोले। "अखबार में जो छपता है, क्या वही सच का पैमाना होता है ?" तीसरे सज्जन ने फिर दूसरे से सवाल किया। दूसरे वाले सज्जन इस सवाल का जबाब क्या दें,इसके लिये अपने दिमाग पर जोर देने लगे। पर...

चाय पर चर्चा -भाग-2

...... भाग-2 ...... इस दौरान मैं एक-दो बार फोन निकाल कर उन मित्र को कॉल कर चुका था। पर वह फोन नहीं उठा रहे थे। मुझे लगा कि वह बाइक चला रहे होंगे। इसलिए नहीं उठा रहे होंगे। मैंने इसीलिये बार-बार फोन करना उचित भी नहीं समझा। क्योंकि मेरे ऐसा करने से उनका ध्यान भंग हो सकता था। मेरी नजरों के सामने सड़क पर लिखे स्लोगन आ गये। जो ड्राइव करने वालों के लिखे होते हैं। "नजर हटी, दुर्घटना घटी।" इसलिये मैंने फोन करके उनकी नजर को हटाना उचित भी नहीं समझा। पर अपने अंदर के रसायनों के तूफान को कैसे संभालूं। यह मेरे लिये मुश्किल होता जा रहा था। क्योंकि मैंने बड़बड़ाना भी शुरू कर दिया था। कैसे लोग हैं यार, समय देते हैं। और समय से आते भी नहीं हैं। ऐसे लोगों के लिए समय की कोई कीमत ही नहीं। अरे, खुद ही कमसे कम फोन कर देते। मुझे मालूम है कि कोई जब मेरा इंतजार करता होगा। यही सब कहता होगा। मैंने वापस लौटने का फैसला कर लिया। पर फिर सोचा, जब एक घंटा मैंने इंतजार कर ही लिया तो कुछ और सही। पर अपनी बेचैनी को कैसे कम करूँ ? यह सवाल भी साथ खड़ा था।  ... अचानक मुझे एक हल सूझ गया। अरे, क्यों नहीं तब तक मैं ...

"दुर्गमिस्तान"

... भाग- 01 ... आपको नाम सुना सुना और सूना सूना भी लग रहा होगा ? पर अभी आपको ठीक-ठीक समझ नहीं आया होगा कि यह कहाँ सुना ? और यह जगह कहाँ है ? आपको ठीक-ठीक वह वाली फीलिंग आ रही होगी 'कि मेरे पेट में तो बात आ रही है, पर दिमाग में नहीं।' चलो हम ही बता देते हैं। यह एक प्रकार की जेलों का सामूहिक नाम है। और क्लीयर करूँ तो "दुर्गम" एक जेल का नाम है, और "दुर्गमिस्तान" बहुत सारे दुर्गम जेलों के समूह का नाम है। यह खास प्रकार की आधुनिक जेलें हैं। जहाँ एक से लेकर बीस-बीस, पच्चीस-पच्चीस कैदी बंद रहते हैं। और इन जेलों में कैदियों को तब तक बंद रखा जाता है जब तक वह साठ साल के न हो जांय। ... इन जेलों की खासियत यह है कि इनकी कोई ऊंची दीवारें नहीं हैं, पर एक सीमा रेखा है। जिसको हर कोई नहीं लांघ सकता। साठ साल से पहले हर कोई इस सीमा को लांघने का प्रयास करता है। पर विरले ही साठ साल से पहले इस सीमा रेखा को पार कर पाते हैं। इस सीमा को लांघने का हर कोई प्रयास करता है पर या तो उसके पैर छोटे पड़ जाते हैं या फिर पापी पेट सामने आ जाता है। इस सीमा को वही लांघ सकता है जिसके पैर ब...

"चाय पर चर्चा"

... भाग-1 ... चाय पर चर्चा का इतिहास काफी पुराना है। अब यह मत मान लीजिएगा कि इस पोस्ट में चाय के गुणों की कोई चर्चा होगी। सिंपल टी, लेमन टी, ग्रीन टी,ब्लैक टी, अदरक टी, तुलसी टी, मसाला टी जैसे प्रकारों की चर्चा भी इसमें नहीं होगी। कभी-कभी शीर्षक से कुछ और भाव आता है और वास्तविक भाव कुछ और होता है। जैसे मंच में डाइस के सामने खड़े और भाषण देते हुये नेता को देखो तो वह बहुत ही ईमानदार नजर आता है। पर जब मंच से नीचे उतरने पर उसे कभी देखो तो शक होता है कि यह वही सज्जन  थे या कोई और हैं। इसलिये इससे पहले पोस्ट आगे बढ़े, आपको आगाह कराना मेरा फर्ज है। पता लगा कि आप चाय की जानकारी लेने के (शीर्षक के भाव के) चक्कर में पूरी पोस्ट पढ़ लो और बाद में निराश हों। जैसे नेता को चुनने के बाद निराश होना पड़ता है। इसलिए इस पोस्ट पर तभी बने रहें जब चाय की जानकारी के शौकीन न हों। इस शीर्षक को आप इस कोण से देखें "चाय की दुकान पर चर्चा"। ... अभी परसों मैं किसी मित्र का इंतजार कर रहा था। मिलने का समय दस बजे निर्धारित हुआ था। पर मित्र भारतीय समयानुसार ग्यारह बजे भी नहीं पहुंचे। क्योंकि भारतीय समय...